पति की असहमति के बीच महिला के आईवीएफ से मां बनने के अधिकार पर कर्नाटक हाईकोर्ट में सुनवाई

पति द्वारा सहमति वापस ले लिए जाने और फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका लंबित रहने के दौरान क्या कोई महिला आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रक्रिया के जरिए मां बनने का अधिकार रखती है? कर्नाटक हाईकोर्ट इस बेहद जटिल कानूनी और सामाजिक सवाल की समीक्षा कर रहा है। बेंगलुरु की एक 41 वर्षीय महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूरज गोविंदराज की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त के लिए तय की है। याचिकाकर्ता ने कोलमंगला स्थित एक फर्टिलिटी क्लिनिक को निर्देश देने की मांग की है कि पति की सहमति न होने के बावजूद उसका आईवीएफ उपचार आगे बढ़ाया जाए।

एआरटी कानून और मातृत्व का अधिकार

यह पूरा विवाद सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (नियमन) अधिनियम, 2021 (एआरटी एक्ट) की धारा 22 से जुड़ा है। यह धारा क्लिनिकों को प्रक्रिया में शामिल सभी पक्षों की लिखित और सूचित सहमति के बिना कोई भी उपचार करने से रोकती है। वर्ष 2022 में शादी के बंधन में बंधे इस जोड़े ने पति के शुक्राणुओं का उपयोग करके छह बार आईवीएफ उपचार कराया था, लेकिन सफलता नहीं मिली। दोनों की यह दूसरी शादी थी और उन्होंने गोद लेने के लिए भी आवेदन किया था। बाद में विवाद होने पर दंपति अलग रहने लगे और पति ने क्रूरता के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल कर दी। मध्यस्थता विफल होने के बाद पति ने आईवीएफ के लिए दी गई अपनी सहमति वापस ले ली।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट में पांच नए जजों की नियुक्ति के लिए अनुशंसित नामों को सरकार जल्द दे सकती है मंजूरी

अदालत में याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता मीर परवेज़ अहमद ने तर्क दिया कि शुरुआत में शुक्राणु प्रदान करना भविष्य के उपचार के लिए एक निहित सहमति थी। उन्होंने कहा कि पति द्वारा असहमति जताने से महिला का मातृत्व का अधिकार प्रभावित हो रहा है। मौजूदा वैधानिक बंदिशों के कारण महिला न तो पति के संरक्षित शुक्राणुओं का उपयोग कर पा रही है और न ही किसी नए डोनर की मदद ले पा रही है।

केंद्र सरकार और पति के वकील का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता साधना एस. देसाई ने अदालत को बताया कि मौजूदा एआरटी कानून के तहत केवल विवाहित जोड़े (कमीशनिंग कपल), विधवाएं या तलाकशुदा महिलाएं ही सहायक प्रजनन तकनीक का लाभ उठाने के लिए पात्र हैं। चूंकि याचिकाकर्ता की शादी कानूनी रूप से बनी हुई है और तलाक का मामला अभी लंबित है, इसलिए एकल उपचार या नए डोनर की अनुमति देना कानून के तय दायरे से बाहर होगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बच्चों का कल्याण इस अधिनियम के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।

वहीं, पति के वकील चिन्मय जे. मिर्जी ने प्रक्रिया के बाद जन्म लेने वाले बच्चे की वित्तीय देनदारियों, भरण-पोषण और संपत्ति में उत्तराधिकार के अधिकारों को लेकर चिंता जताई। इसके जवाब में याचिकाकर्ता के वकील ने स्पष्ट किया कि महिला आईवीएफ से जन्म लेने वाले बच्चे के लिए पति से भरण-पोषण या संपत्ति में अधिकार का दावा नहीं करेगी। इस पर पति के वकील ने समय मांगा कि क्या पत्नी द्वारा ऐसा औपचारिक हलफनामा (अंडरटेकिंग) देने से इस आपत्ति का समाधान हो सकता है।

READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने राजीव गांधी ट्रस्ट द्वारा एफसीआरए रद्द करने को दी गई चुनौती पर केंद्र का रुख मांगा

हाईकोर्ट की टिप्पणियां और भविष्य की दिशा

28 जुलाई की सुनवाई के दौरान जस्टिस गोविंदराज ने कहा कि यह एक जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दा है, जिसकी कल्पना शायद एआरटी कानून बनाते समय नहीं की गई थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि न्यायिक प्रणाली में तलाक के मामलों में अक्सर लंबा समय लगता है, लेकिन ऐसे में जिन नागरिकों की कोई गलती नहीं है, उन्हें कानूनी विकल्पों से वंचित नहीं छोड़ा जा सकता।

READ ALSO  No Coercive Action if Police Notice Under Section 35 BNSS Lacks Details: Karnataka High Court

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश दिया है कि यदि एआरटी एक्ट के तहत राहत संभव नहीं होती है, तो वे अन्य संबंधित कानूनों के प्रावधानों का अध्ययन कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को भी 18 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में उपस्थित रहकर इस विधायी मुद्दे पर विचार रखने का निर्देश दिया है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles