बॉम्बे हाईकोर्ट ने वन्यजीवों द्वारा किए गए नुकसान के मामले में राज्य सरकार की जिम्मेदारी तय करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने स्पष्ट किया है कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत तोते ‘वन्यजीव’ की परिभाषा में आते हैं। अदालत ने कहा कि चूंकि वन्यजीव राज्य की संपत्ति माने जाते हैं, इसलिए उनके द्वारा नागरिकों को पहुंचाए गए नुकसान की भरपाई करना सरकार का कानूनी कर्तव्य है।
हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि वह उस 70 वर्षीय किसान को मुआवजा दे, जिसकी अनार की फसल को जंगली तोतों ने बर्बाद कर दिया था। इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि मुआवजा केवल हाथी या बायसन जैसे बड़े जानवरों द्वारा किए गए नुकसान तक ही सीमित है।
यह याचिका वर्धा जिले के हिंगी गांव के रहने वाले किसान महादेव डेकाटे ने दायर की थी। डेकाटे का एक वन्यजीव अभयारण्य के पास अनार का बगीचा है। मई 2016 में, अभयारण्य से आए बड़ी संख्या में जंगली तोतों ने उनके बगीचे पर हमला कर दिया, जिससे उनके फलों के पेड़ों को भारी नुकसान पहुंचा।
इस घटना के बाद, डेकाटे ने वन विभाग और कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया। एक संयुक्त निरीक्षण में पुष्टि हुई कि उनकी लगभग 50 प्रतिशत फसल नष्ट हो गई थी। हालांकि, अधिकारियों ने मुआवजा देने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि मौजूदा सरकारी प्रस्तावों (GR) में पक्षियों द्वारा किए गए नुकसान के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बाद डेकाटे ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और लगभग 20 लाख रुपये के नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि फसल के नुकसान का मुआवजा विशिष्ट सरकारी प्रस्तावों के अधीन है। सरकार के अनुसार, ये प्रस्ताव केवल हाथी और बायसन जैसे वन्यजीवों द्वारा किए गए नुकसान को ही मुआवजे के दायरे में रखते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि तोते जैसे पक्षी इस योजना के अंतर्गत नहीं आते।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अधिनियम ‘वन्यजीव’ को प्रकृति में जंगली पाए जाने वाले किसी भी जानवर के रूप में परिभाषित करता है और इसमें स्पष्ट रूप से तोतों (पैराकिट्स) की विभिन्न प्रजातियों को शामिल किया गया है। इसलिए, वैधानिक परिभाषा को सीमित प्रशासनिक प्रस्तावों से ऊपर माना जाना चाहिए।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की खंडपीठ ने वन्यजीव अधिनियम और राज्य की मुआवजा नीतियों का गहराई से अवलोकन किया। कोर्ट ने नोट किया कि 1972 के अधिनियम के तहत, वन्यजीवों को राज्य की संपत्ति घोषित किया गया है।
बेंच ने कहा कि मुआवजा योजनाओं से कुछ प्रजातियों को बाहर रखना तर्कहीन है और यह संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है:
“यह कहने का कोई तर्क नहीं है कि केवल कुछ प्रजातियों द्वारा किया गया नुकसान ही किसानों को मुआवजा पाने का हकदार बनाएगा। यह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।”
कोर्ट ने आगे जोर देकर कहा कि इस तरह के मुआवजे का उद्देश्य मानव-पशु संघर्ष को रोककर वन्यजीवों की रक्षा करना है। यदि किसानों को बिना किसी सहायता के नुकसान सहने के लिए छोड़ दिया गया, तो वे अपनी आजीविका बचाने के लिए जानवरों को नुकसान पहुंचाने का रास्ता अपना सकते हैं।
“कानून हर नागरिक से वन्यजीवों का रक्षक होने की अपेक्षा करता है, इसलिए यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे वन्यजीवों के कारण होने वाले नुकसान को स्वयं झेलें। अन्यथा, वन्यजीवों की रक्षा का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा और प्रभावित व्यक्ति अपनी फसलों और पेड़ों को बचाने के लिए स्वयं के तरीके अपना सकते हैं, जिससे वन्यजीवों को नुकसान पहुंच सकता है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम एक केंद्रीय कानून है, इसलिए यह किसी भी विरोधाभासी या सीमित सरकारी प्रस्ताव पर हावी रहेगा।
याचिकाकर्ता की इस दलील को स्वीकार करते हुए कि तोते कानून के तहत संरक्षित ‘वन्यजीव’ हैं, हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को किसान को मुआवजा देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह बगीचे में क्षतिग्रस्त हुए 200 पेड़ों के लिए 200 रुपये प्रति पेड़ की दर से मुआवजे का भुगतान करे।

