दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली राज्य अल्पसंख्यक आयोग में लंबे समय से रिक्त पड़े पदों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है कि आखिर 2023 से अध्यक्ष और सदस्यों के पद खाली क्यों पड़े हैं।
चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने टिप्पणी की कि कानून में ‘जितनी जल्दी हो सके’ (as soon as may be) रिक्तियों को भरने का प्रावधान है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन संवैधानिक पदों को ‘अनिश्चितकाल के लिए खाली’ रखा जाए। कोर्ट ने अब अधिकारियों को नियुक्ति प्रक्रिया तुरंत शुरू करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप सालेक चंद जैन द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) के बाद आया है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने प्रशासन की बड़ी खामी की ओर इशारा किया। उन्होंने बताया कि 24 अगस्त, 2023 से दिल्ली राज्य अल्पसंख्यक आयोग में न तो कोई अध्यक्ष है और न ही कोई सदस्य।
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के तहत, राजधानी में अल्पसंख्यक समुदायों के हितों की रक्षा के लिए इन पदों का भरा होना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतने लंबे समय तक नेतृत्व की अनुपस्थिति के कारण यह आयोग व्यावहारिक रूप से निष्क्रिय हो गया है।
बेंच ने नियुक्ति प्रक्रिया में एक साल से जारी सुस्ती पर गहरी चिंता व्यक्त की। सरकार की ओर से हो रही देरी पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने अधिनियम की धारा 4(5) की व्याख्या की। बेंच ने स्पष्ट किया कि ‘जितनी जल्दी हो सके’ शब्द का अर्थ तत्परता से है, न कि देरी के बहाने के रूप में।
बेंच ने कहा, “केवल इसलिए कि अधिनियम की धारा 4 की उप-धारा (5) में कहा गया है कि सरकार द्वारा रिक्ति को ‘जितनी जल्दी हो सके’ भरा जाएगा, इसका मतलब यह नहीं है कि पद को हमेशा के लिए खाली रखा जा सकता है।”
अदालत ने दिल्ली सरकार को एक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। यह हलफनामा प्रिंसिपल सेक्रेटरी या एडिशनल चीफ सेक्रेटरी रैंक से नीचे के अधिकारी द्वारा नहीं दिया जाना चाहिए।
सरकार को सौंपे जाने वाले हलफनामे में न केवल अगस्त 2023 से हो रही देरी के कारणों को स्पष्ट करना होगा, बल्कि निम्नलिखित विवरण भी देने होंगे:
- नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रशासन द्वारा अब तक उठाए गए कदमों का विवरण।
- एक निश्चित समय-सीमा (Timeline), जिसके भीतर आयोग में रिक्तियों को भर दिया जाएगा।
इस मामले की अगली सुनवाई अब 12 अगस्त को होगी। तब तक दिल्ली सरकार को अपना औपचारिक जवाब और आयोग के पुनर्गठन के लिए एक ठोस कार्ययोजना पेश करनी होगी।

