सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले को रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया है कि मस्जिद को सेवा प्रदान करने के लिए ‘सर्विस इनाम’ (Service Inam) के रूप में दी गई भूमि वक्फ संपत्ति की श्रेणी में आती है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि स्वामित्व की घोषणा (Declaration of Title) चाहने वाले वादी को अपने स्वयं के साक्ष्यों के आधार पर केस जीतना चाहिए, न कि प्रतिवादी की कमियों का सहारा लेकर।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने आंध्र प्रदेश वक्फ ट्रिब्यूनल के 2009 के उस निर्णय को बहाल कर दिया, जिसमें कुरनूल जिले की तीन एकड़ जमीन पर निजी व्यक्तियों के स्वामित्व के दावे को खारिज कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद कुरनूल के कल्लर गांव की सर्वे नंबर 914/B की 3.00 एकड़ भूमि से जुड़ा था। वादी (उत्तरदाता) ने 1985 और 1996 के पंजीकृत बिक्री विलेखों (Sale Deeds) के माध्यम से पूर्ण स्वामित्व का दावा किया था और अपने मालिकाना हक को 1945 के एक विभाजन विलेख (Partition Deed) से जोड़ा था। उनका तर्क था कि यह भूमि कुरनूल के तत्कालीन नवाब द्वारा दी गई ‘व्यक्तिगत इनाम’ (Personal Inam) थी।
इसके विपरीत, आंध्र प्रदेश राज्य वक्फ बोर्ड (अपीलकर्ता) का कहना था कि यह भूमि बुड्ढा बुड्डी मस्जिद से जुड़ी ‘सर्विस इनाम’ भूमि है, जिसका प्रमाण टाइटल डीड नंबर 3826 और 1963 की गजट अधिसूचना है। वक्फ ट्रिब्यूनल ने शुरू में वादी के मुकदमे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वे वैध स्वामित्व साबित करने में विफल रहे। हालांकि, हाईकोर्ट ने 2011 में इसे उलट दिया था, जिसके खिलाफ वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (वक्फ बोर्ड) की ओर से: वक्फ बोर्ड ने तर्क दिया कि 1945 का विभाजन विलेख, जिस पर वादी भरोसा कर रहे थे, स्पष्ट रूप से संपत्ति को बुड्ढा बुड्डी और अस्तबल मस्जिदों की सेवा के लिए ‘सर्विस इनाम’ भूमि बताता है। सय्यद अली बनाम ए.पी. वक्फ बोर्ड (1998) का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के अनुदान संपत्ति को वक्फ का चरित्र प्रदान करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने सबूत का बोझ गलत तरीके से प्रतिवादी पर डाल दिया।
उत्तरदाता (वादी) की ओर से: उत्तरदाताओं ने दावा किया कि वे दशकों से पंजीकृत विलेखों के तहत शांतिपूर्ण कब्जे में थे। उनका तर्क था कि वक्फ बोर्ड मूल टाइटल डीड (नंबर 3826) पेश करने में विफल रहा और 1963 की अधिसूचना में विशिष्ट सर्वे नंबरों का अभाव था। उन्होंने वक्फ बोर्ड ऑफ ए.पी. बनाम बिरादावोलु रमना रेड्डी (1999) का हवाला देते हुए कहा कि समाप्त हो चुके अधिकारों को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अपना विश्लेषण मुख्य रूप से 1945 के विभाजन विलेख पर केंद्रित किया। जस्टिस मसीह ने नोट किया:
“उक्त दस्तावेज के अवलोकन से स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि इसके तहत आने वाली भूमि… को बुड्ढा बुड्डी मस्जिद और अस्तबल मस्जिद को सेवाएं प्रदान करने के लिए ‘सर्विस इनाम’ भूमि के रूप में वर्णित किया गया है।”
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब किसी संपत्ति की पहचान धार्मिक उद्देश्यों के लिए सर्विस इनाम के रूप में हो जाती है, तो वह “एक सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट के रूप में स्थापित हो जाती है, जिससे उसका हस्तांतरण प्रतिबंधित हो जाता है।”
सबूत के बोझ पर: कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा सबूत का बोझ बदलने की आलोचना की। पी. किशोर कुमार बनाम विट्ठल के. पाटकर (2024) और रंगम्मल बनाम कुप्पुस्वामी (2011) का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा:
“स्वामित्व की घोषणा चाहने वाले वादी को अपने मामले की मजबूती पर सफल होना चाहिए न कि बचाव की कमजोरी पर… ठोस शीर्षक दस्तावेज पेश करने में विफलता दावे के लिए घातक है।”
स्वीकारोक्ति और साक्ष्य पर: कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि पहले वादी (PW-1) ने गवाही के दौरान स्वीकार किया था कि भूमि मस्जिद की सेवाओं के लिए आवंटित की गई थी। पीठ ने कहा कि ऐसी स्वीकारोक्ति को “हल्के में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।” हालांकि मूल टाइटल डीड इसकी “भुरभुरी स्थिति” (Brittle Condition) के कारण पेश नहीं की जा सकी, लेकिन कोर्ट ने सर्वे कमिश्नर की रिपोर्ट और 1963 की गजट अधिसूचना को वक्फ चरित्र स्थापित करने के लिए पर्याप्त पाया।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उत्तरदाता वैध स्वामित्व या कानूनी कब्जा साबित करने में विफल रहे। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने सबूतों का पुन: मूल्यांकन करके और 1945 के विलेख की महत्वपूर्ण बातों की अनदेखी करके अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) का उल्लंघन किया है।
“हमारी सुविचारित राय है कि विवादित संपत्ति एक धार्मिक संस्था से जुड़ी ‘सर्विस इनाम’ भूमि है और वक्फ संपत्ति का हिस्सा है।”
नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली, 18.01.2011 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रिब्यूनल के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें मुकदमा खारिज किया गया था।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: ए.पी. राज्य वक्फ बोर्ड बनाम जानकी बुसप्पा और अन्य
- सिविल अपील संख्या: 1946 / 2013
- पीठ: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
- दिनांक: 24 अप्रैल, 2026

