उत्तर प्रदेश के हजारों इन-सर्विस शिक्षकों के करियर को प्रभावित करने वाले एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आज नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) से ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग (ODL) मोड के माध्यम से 18 महीने का डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (D.El.Ed.) प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को अंतरिम राहत प्रदान की है। हाईकोर्ट ने उन्हें रिट याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UP TET) 2026 में बैठने की अनुमति दी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने रिट ए संख्या 4196 वर्ष 2026 में पारित किया। याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता रजत राजन सिंह ने किया। कोर्ट ने राज्य सरकार, परीक्षा आयोग और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) को अपने संबंधित जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 22 मई 2026 को तय की गई है।
एक लंबा कानूनी संघर्ष
इस विवाद की जड़ें बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2017 में निहित हैं। इस संशोधन के माध्यम से RTE अधिनियम की धारा 23(2) में 1 अप्रैल 2015 से पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ एक दूसरा प्रावधान जोड़ा गया था। इसके तहत उन सभी इन-सर्विस शिक्षकों के लिए, जिनके पास दो साल के D.El.Ed. की न्यूनतम योग्यता नहीं थी, 31 मार्च 2019 तक इसे प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया था। योग्यता प्राप्त न करने की स्थिति में उन्हें सेवा से बर्खास्तगी का सामना करना पड़ता।
इसे सुविधाजनक बनाने के लिए, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) ने NCTE को निर्देशित किया, जिसने 22 सितंबर 2017 को एक मान्यता आदेश जारी कर NIOS को ODL मोड के माध्यम से 18 महीने का D.El.Ed. कार्यक्रम संचालित करने की अनुमति दी। यह कार्यक्रम विशेष रूप से उन अप्रशिक्षित प्रारंभिक शिक्षकों के लिए था जो 10 अगस्त 2017 को या उससे पहले नियुक्त हुए थे। 31 मार्च 2019 की समय सीमा के कारण पाठ्यक्रम की अवधि को मानक दो वर्षों से घटाकर 18 महीने किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और स्पष्टीकरण
कानूनी विवाद तब बढ़ा जब उत्तराखंड राज्य ने शुरू में ODL डिप्लोमा धारकों को सहायक शिक्षकों (प्राथमिक) के रूप में नई भर्ती के लिए आवेदन करने की अनुमति दी, लेकिन फरवरी 2021 में इसे वापस ले लिया। राज्य का तर्क था कि सेवा नियमावली में 18 महीने के डिप्लोमा को न्यूनतम योग्यता के रूप में मान्यता देने का कोई प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने जयवीर सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य (2024) के ऐतिहासिक फैसले में उत्तराखंड हाईकोर्ट के पहले के आदेश को उलट दिया था। न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने तब कहा था कि ODL योजना विशेष रूप से इन-सर्विस शिक्षकों के लिए एक बार का अवसर थी और इसे नई भर्ती के उद्देश्यों के लिए दो साल के डिप्लोमा के बराबर नहीं माना जा सकता।
हालाँकि, बाद में एक समीक्षा याचिका दायर की गई, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर 2024 को स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति 10 अगस्त 2017 तक सेवा में थे और जिन्होंने डिप्लोमा पूरा किया है, “उन्हें अन्य संस्थानों में आवेदन करने या पदोन्नति के अवसरों के लिए वैध डिप्लोमा धारक माना जाएगा।” इस स्पष्टीकरण के दायरे को विश्वनाथ बनाम उत्तराखंड राज्य (2025) मामले में और विस्तार दिया गया, जहां कोर्ट ने कहा कि “निश्चित रूप से, ‘अन्य संस्थानों’ में राज्य सरकारों द्वारा संचालित स्कूल भी शामिल होंगे।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट का वर्तमान हस्तक्षेप
अब यह मामला उत्तर प्रदेश के संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष आया है, जहां ODL डिप्लोमा धारकों को UP TET 2026 में बैठने की पात्रता से वंचित किया जा रहा था। राज्य में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षकों के रूप में नियुक्ति के लिए यह परीक्षा अनिवार्य है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता रजत राजन सिंह ने तर्क दिया कि उन उम्मीदवारों को TET में शामिल होने से रोकना, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों (10 अगस्त 2017 तक सेवा में होना और 18 महीने का डिप्लोमा पूरा करना) को पूरा करते हैं, सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2025 के विश्वनाथ निर्णय और दिसंबर 2024 के समीक्षा आदेश का सीधा उल्लंघन है।
अधिवक्ताओं की दलीलों को सुनने के बाद, न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए ODL डिप्लोमा धारकों को UP TET 2026 में शामिल होने की अनुमति प्रदान की।
(यह रिपोर्टिंग खुली अदालत में पारित मौखिक आदेशों पर आधारित है और विस्तृत अंतरिम आदेश अभी अपलोड किया जाना शेष है)
केस विवरण
केस शीर्षक: शुभम कुमार शुक्ला एवं अन्य बनाम उप्र राज्य एवं अन्य
केस संख्या: रिट ए संख्या 4196/2026
पीठ: न्यायमूर्ति राजीव सिंह
दिनांक: 24 अप्रैल 2026

