सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में शिकायतकर्ता के ससुर, सास और ननद के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि वैवाहिक विवादों में “सामान्य और व्यापक आरोपों” (generalized and sweeping accusations) को, बिना किसी सक्रिय संलिप्तता के सबूत के, आपराधिक अभियोजन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केरल हाईकोर्ट के नवंबर 2024 के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने एफआईआर संख्या 1318/2016 को रद्द करने से इनकार कर दिया था। उल्लेखनीय है कि पति के खिलाफ कार्यवाही इस अपील का हिस्सा नहीं थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला शिकायतकर्ता (पत्नी) द्वारा 24 अगस्त 2016 को दर्ज कराई गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। उसकी शादी दिसंबर 2007 में श्याम शिवरामन नायर से हुई थी। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 (द्विविवाह), 498A (क्रूरता) और 34 के तहत मामला दर्ज किया था।
शिकायत के अनुसार, पत्नी ने आरोप लगाया कि अबू धाबी और केरल में रहने के दौरान उसके पति ने दहेज के लिए उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। उसने ₹30 लाख और 47 तोला सोने की मांग का भी जिक्र किया। इसके अलावा, उसने दावा किया कि 2010 में सऊदी अरब में रहने के दौरान उसने अपने ससुराल वालों को 153 तोला सोना बेचने की चर्चा करते सुना था, जिसे कथित तौर पर पति के लिए कार और ननद के लिए फ्लैट खरीदने में इस्तेमाल किया गया। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति ने 2013 में उसकी जानकारी के बिना दूसरा विवाह कर लिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (ससुराल वालों) के वकील ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता बुजुर्ग हैं और संबंधित अवधि के दौरान शिकायतकर्ता के साथ नहीं रह रहे थे। उन्होंने कहा कि आरोप अस्पष्ट हैं और 2007-2010 की घटनाओं के लिए 2016 में प्राथमिकी दर्ज करना केवल परेशान करने की मंशा दर्शाता है। धारा 494 के संबंध में, एस. निथीन बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि द्विविवाह का दायित्व पति के रिश्तेदारों पर तब तक नहीं डाला जा सकता जब तक कि दूसरे विवाह को संपन्न कराने में उनकी सक्रिय भूमिका साबित न हो।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि ससुराल वाले वैवाहिक जीवन के लिए अजनबी नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों ने शिकायतकर्ता के भाई से पैसे लिए, उसके गहने बेचने में मिलीभगत की और दूसरे विवाह की जानकारी होने के बावजूद पति के आचरण को बढ़ावा दिया।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 482 CrPC के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का विश्लेषण करते हुए हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल मामले के सिद्धांतों का संदर्भ दिया।
धारा 498A (क्रूरता) पर टिप्पणी
अदालत ने पाया कि शिकायत के मुख्य आरोप पति के खिलाफ हैं। ससुराल वालों के संबंध में पीठ ने कहा:
“वैवाहिक विवाद से उत्पन्न होने वाले आपराधिक मामले में परिवार के सदस्यों के नामों का केवल उल्लेख करना, उनके सक्रिय जुड़ाव के विशिष्ट आरोपों के बिना, शुरुआत में ही समाप्त (nipped in the bud) कर दिया जाना चाहिए।”
पीठ ने पाया कि प्राथमिकी में ससुर या सास द्वारा किसी विशिष्ट मांग, धमकी या शारीरिक हमले का जिक्र नहीं है। ननद के खिलाफ भी केवल पैसे प्राप्त करने का आरोप क्रूरता के अपराध के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।
धारा 494 (द्विविवाह) पर टिप्पणी
अदालत ने एस. निथीन मामले के आधार पर स्पष्ट किया कि द्विविवाह का आरोप साबित करने के लिए आरोपी की सक्रिय भूमिका या चूक का प्रमाण आवश्यक है। केवल “जानकारी” होने पर अदालत ने कहा:
“भले ही यह मान लिया जाए कि अपीलकर्ताओं को दूसरे विवाह की जानकारी थी, लेकिन केवल यह जानकारी होना कि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कोई कृत्य किया गया है, अपने आप में साझा इरादे (common intention) को स्थापित नहीं करता है।”
अदालत को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह संकेत मिले कि ससुराल वालों ने दूसरे विवाह को संपन्न कराने में कोई सक्रिय सहायता या प्रोत्साहन दिया था।
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही, अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए ससुर, सास और ननद के खिलाफ एफआईआर संख्या 1318/2016 से संबंधित सभी कार्यवाही समाप्त कर दी।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: शिवरामन नायर और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील @ SLP (Crl.) No. 9195 of 2025 (2026 INSC 412)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
- फैसले की तारीख: 24 अप्रैल, 2026

