शामली गोकशी मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखी NSA के तहत हिरासत, कहा— यह ‘पब्लिक ऑर्डर’ का विषय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोकशी के एक आरोपी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संवेदनशील क्षेत्रों में गोकशी की घटनाएं केवल ‘कानून-व्यवस्था’ (Law and Order) का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह ‘जनता की व्यवस्था’ (Public Order) के लिए खतरा हैं।

सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण फैसले में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शामली के एक गोकशी मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत आरोपी की हिरासत को सही ठहराया है। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने कहा कि इस तरह के अपराध, विशेष रूप से त्योहारों के आसपास, समाज की शांति और सामान्य जीवन की गति को बाधित करने की क्षमता रखते हैं।

यह पूरा मामला 15 मार्च, 2025 का है, जब शामली जिले के लवादाउदपुर गांव के एक खेत से पुलिस टीम ने एक गाय के अवशेष बरामद किए थे। इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी।

पुलिस जांच में इस कृत्य में शामिल समीर सहित पांच आरोपियों की पहचान की गई थी। सांप्रदायिक तनाव की आशंका और अपराध की गंभीरता को देखते हुए, शामली के जिला मजिस्ट्रेट ने 15 मई, 2025 को समीर के खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया था।

याचिकाकर्ता समीर ने अपने पिता शमशाद के माध्यम से इस हिरासत को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि यह एक सामान्य आपराधिक मामला है और इसमें एनएसए जैसी सख्त धाराएं लगाना अनुचित है।

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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या यह कथित कृत्य ‘कानून-व्यवस्था’ (जो केवल व्यक्तियों को प्रभावित करता है) के दायरे में आता है या ‘जन व्यवस्था’ (जो पूरे समुदाय को प्रभावित करता है) के।

हिरासत आदेश का अवलोकन करते हुए, खंडपीठ ने पाया कि इस घटना ने स्थानीय आबादी के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया था। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि यह घटना होली के त्योहार से ठीक पहले हुई थी, जो कि सांप्रदायिक रूप से एक बेहद संवेदनशील समय होता है।

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 के प्रावधानों का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने कहा, “हमने हिरासत आदेश का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया है और पाया है कि यह मामला निश्चित रूप से जन व्यवस्था (Public Order) से संबंधित है, न कि केवल कानून-व्यवस्था (Law and Order) से।”

हाईकोर्ट ने माना कि यदि इस प्रकार के अपराधों की पुनरावृत्ति होती है, तो इससे इलाके की शांति और स्थिरता खतरे में पड़ जाएगी। खंडपीठ ने टिप्पणी की:

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“इस तरह के अपराध, यदि दोहराए जाते हैं, तो इलाके के सामान्य जीवन की गति को खतरे में डाल देंगे और परिणामस्वरूप जन व्यवस्था (Public Order) प्रभावित होगी।”

जिला मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई कानूनी खामी न पाते हुए, हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया और एनएसए के तहत हिरासत को बरकरार रखा।

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