आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने तीन सिविल रिवीजन याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि कमर्शियल विवादों में लिखित बहस (written arguments) के चरण पर बिना किसी ठोस या उचित कारण के नए दस्तावेज पेश करने या गवाहों को दोबारा बुलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम की खंडपीठ ने जोर दिया कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक विवादों का “शीघ्र निपटारा” करना है, इसलिए प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला IDMC लिमिटेड (याचिकाकर्ता/प्रतिवादी) और मेसर्स C-Star इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स (प्रतिवादी/वादी) के बीच बकाया राशि की वसूली से जुड़ा है। यह मुकदमा मूल रूप से 2017 में दर्ज किया गया था, जिसे बाद में विशाखापत्तनम स्थित कमर्शियल विवादों के लिए विशेष जज की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया और इसे C.O.S.No.10 of 2022 के रूप में पुनः क्रमांकित किया गया।
मुकदमे में साक्ष्य (evidence) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, जब मामला लिखित बहस के लिए रखा गया, तब प्रतिवादियों ने तीन अंतरिम आवेदन (I.As) दायर किए:
- I.A.No.268 of 2025: गवाह PW 1 की दोबारा जिरह के लिए साक्ष्य की प्रक्रिया फिर से शुरू करने हेतु।
- I.A.No.269 of 2025: CPC के ऑर्डर XVIII रूल 17 के तहत PW 1 को दोबारा बुलाने हेतु।
- I.A.No.270 of 2025: 29 जून 2012 के एक कानूनी नोटिस को साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लेने हेतु।
विशेष जज ने 14 नवंबर 2025 को इन सभी आवेदनों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि संबंधित दस्तावेज हमेशा से प्रतिवादियों के पास ही थे। इस निर्णय को प्रतिवादियों ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि 29 जून 2012 के कानूनी नोटिस का जिक्र वादी ने अपने वाद-पत्र (plaint) में किया था, लेकिन उसे अदालत में पेश नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि इस चूक का पता उन्हें “हाल ही में बहस की तैयारी के दौरान” चला। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि साक्ष्य बंद होने के तुरंत बाद आवेदन दिया गया, इसलिए इसमें उनकी ओर से कोई लापरवाही नहीं थी।
दूसरी ओर, हाईकोर्ट ने पाया कि वह कानूनी नोटिस वादी द्वारा प्रतिवादियों को ही भेजा गया था, इसलिए वह हमेशा से प्रतिवादियों के “कब्जे और नियंत्रण” में था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि प्रतिवादियों ने 2016 में अपना लिखित जवाब दाखिल किया था, लेकिन तब इस दस्तावेज का कोई जिक्र नहीं किया गया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने कमर्शियल अदालतों के लिए लागू Order XI Rule 1 (10) CPC के प्रावधानों पर ध्यान केंद्रित किया। यह नियम स्पष्ट करता है कि प्रतिवादी उन दस्तावेजों पर भरोसा नहीं कर सकता जो लिखित जवाब के साथ पेश नहीं किए गए थे, जब तक कि वह इसे समय पर पेश न करने का कोई “उचित कारण” साबित न कर दे।
खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“कानून का जनादेश यह है कि अदालत ऐसी अनुमति केवल तभी प्रदान करेगी जब प्रतिवादी लिखित बयान के साथ दस्तावेज पेश न करने का उचित कारण स्थापित करे। अतः, किसी उचित कारण के अभाव में, अदालत अनुमति नहीं देगी।”
गवाह को दोबारा बुलाने के संबंध में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Bagai Construction v. Gupta Building Material Store (2013) मामले का संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा कि ऑर्डर 18 रूल 17 CPC के तहत शक्ति का प्रयोग बहुत ही कम मामलों में किया जाना चाहिए और इसका उपयोग साक्ष्य की कमियों को भरने के लिए नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने K.K. Velusamy मामले के सिद्धांतों को उद्धृत करते हुए कहा:
“यदि आवेदन शरारतपूर्ण, तुच्छ या लापरवाही को छिपाने के लिए पाया जाता है, तो उसे भारी जुर्माने के साथ खारिज कर दिया जाना चाहिए।”
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादियों द्वारा बताया गया कारण विश्वास पैदा करने में विफल रहा और यह “उचित कारण” की कसौटी पर खरा नहीं उतरा। कोर्ट ने माना कि लिखित बहस के अंतिम चरण में ऐसे आवेदनों को अनुमति देने से कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए तीनों याचिकाओं को खारिज कर दिया।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: IDMC लिमिटेड और अन्य बनाम मेसर्स C-Star इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स
- केस संख्या: C. R. P. संख्या 3774, 3778 और 3779 of 2025
- पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम
- दिनांक: 22 अप्रैल, 2026

