राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट में कहा कि अलगाववादी नेता यासीन मलिक द्वारा अपने बचाव में बड़े राजनेताओं और नौकरशाहों के नाम लेने से आतंकवादी हाफिज सईद जैसे उग्रवादियों के साथ उसके संबंधों की सच्चाई नहीं बदल जाती। एक औपचारिक प्रत्युत्तर (rejoinder) दाखिल करते हुए एजेंसी ने तर्क दिया कि जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख ने केवल “लोकप्रियता हासिल करने और जनता की सहानुभूति बटोरने” के लिए इन रसूखदार नामों का सहारा लिया है।
यह मामला जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच के समक्ष चल रहा है, जो टेरर फंडिंग के एक मामले में मलिक की उम्रकैद की सजा को फांसी में बदलने की NIA की अपील पर सुनवाई कर रही है।
मई 2022 में, दिल्ली की एक ट्रायल कोर्ट ने यासीन मलिक को भारतीय दंड संहिता (IPC) और कड़े गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत विभिन्न अपराधों का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मलिक ने भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश और आतंकी गतिविधियों के लिए धन जुटाने सहित सभी आरोपों में अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।
साल 2023 में, NIA ने सजा बढ़ाने की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। एजेंसी का कहना है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा इस मामले को “दुर्लभ से दुर्लभतम” (rarest of rare) श्रेणी में न रखना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था। NIA के अनुसार, देश और शहीद सैनिकों के परिवारों द्वारा झेले गए नुकसान के सामने उम्रकैद की सजा नाकाफी है।
NIA का यह जवाब मलिक के उस 85 पन्नों के हलफनामे के जवाब में आया है, जिसमें उसने दावा किया था कि वह लगभग तीन दशकों तक राज्य द्वारा स्वीकृत “बैकचैनल” शांति प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। मलिक ने कहा था कि उसने जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल करने के लिए कई प्रधानमंत्रियों, खुफिया प्रमुखों और बड़े व्यापारियों के साथ मिलकर काम किया है।
इन दावों को खारिज करते हुए NIA ने कहा:
“वरिष्ठ राजनेताओं और नौकरशाहों के नामों का उल्लेख मात्र इस तथ्य को नहीं झुठलाता कि दोषी आरोपी के आतंकी हाफिज सईद और अन्य उग्रवादियों के साथ संबंध थे।”
एजेंसी ने जोर देकर कहा कि मलिक ने खुद स्वीकार किया है कि वह JKLF का “कमांडर-इन-चीफ” था और हिज्ब-उल-मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन के साथ उसके संपर्क थे। NIA ने यह भी आरोप लगाया कि मलिक ने अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित वहां के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क बनाए रखा।
मलिक द्वारा खुद को “बलि का बकरा” (sacrificial goat) बताए जाने पर NIA ने कड़ी आपत्ति जताई। एजेंसी ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के प्रति अनुचित बयानबाजी करार दिया और स्पष्ट किया कि मामला “भावनात्मक कहानियों” पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर आधारित है।
इसके अतिरिक्त, एजेंसी ने तर्क दिया कि 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा या 2016 में बुरहान वानी के एनकाउंटर जैसे संदर्भों का इस टेरर फंडिंग मामले की मेरिट से कोई लेना-देना नहीं है।
यासीन मलिक तिहाड़ जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश हुआ। हाईकोर्ट ने NIA के जवाब को रिकॉर्ड पर ले लिया है और जेल अधिकारियों के माध्यम से इसकी एक प्रति मलिक को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
NIA ने चेतावनी दी कि यदि “खतरनाक आतंकवादियों” को केवल दोष स्वीकार करने के आधार पर मौत की सजा से बचने का मौका दिया गया, तो यह सजा संबंधी नीति का पूरी तरह से पतन होगा।
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई के लिए तय की है।

