सुप्रीम कोर्ट ने कांचीपुरम जिले के थलंबूर गांव में जमीन के सौदों से जुड़ी विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) का निपटारा करते हुए लंबे समय से जारी ‘यथास्थिति’ (status quo) के आदेश को हटा दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार दशकों से सृजित तीसरे पक्ष के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकती और विवादित भूमि पर बने विला और फ्लैटों में रहने वाले लोगों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद मद्रास हाईकोर्ट में एस. राजा द्वारा 2018 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) से शुरू हुआ था। याचिका में थलंबूर गांव में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण और अवैध सौदों का आरोप लगाया गया था, जिसमें मुख्य रूप से सी.ई. सत्यनारायण रेड्डी को आवंटित भूमि और 1966 में स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई जमीन का जिक्र था।
मामले की सुनवाई के दौरान, तमिलनाडु सरकार ने अगस्त 2019 में एक समिति का गठन किया। मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 25 सितंबर 2019 को यह कहते हुए याचिका का निपटारा कर दिया कि सरकार द्वारा जांच शुरू करने से याचिका का उद्देश्य पूरा हो गया है। हालांकि, हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए यथास्थिति के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। राज्य सरकार ने इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद अक्टूबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने पुनः यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया जो पिछले छह वर्षों से प्रभावी था।
विभिन्न पक्षों के तर्क
इस मामले में ‘कासाग्रैंड बिल्डर प्राइवेट लिमिटेड’, घर खरीदारों और शैक्षणिक ट्रस्टों सहित कई तीसरे पक्षों ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने दलील दी कि लंबे समय से जारी यथास्थिति के आदेश से उनका जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
प्रतिवादियों और हस्तक्षेपकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि:
- इन जमीनों के पट्टे (Patta) 1963, 1966 और 1998 जैसे पुराने समय के हैं।
- कासाग्रैंड ने यहां 333 विला और 482 फ्लैट बनाए थे, जिनमें से अधिकांश 2017 से 2020 के बीच बिक चुके हैं और लोग वहां रह रहे हैं।
- आर्मी वेलफेयर हाउसिंग ऑर्गनाइजेशन ने सैनिकों के लिए 852 फ्लैट बनाए, लेकिन कोर्ट के आदेश के कारण उनकी रजिस्ट्री रुकी हुई थी।
- ‘अग्नि कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी’ जैसे संस्थान बुनियादी ढांचे का विस्तार नहीं कर पा रहे थे।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इन जमीनों को ‘अनाधीनम’ (लावारिस/सरकारी) बताते हुए जांच रिपोर्ट की समीक्षा के लिए और समय की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा की जा रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने उल्लेख किया कि 2019 में हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई थी कि जांच छह महीने में पूरी हो जाएगी, लेकिन 2026 तक भी मामला अधर में लटका रहा।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“एक लोक कल्याणकारी राज्य के लिए यह उचित नहीं है कि वह कई दशकों के बाद समय का पहिया पीछे घुमाने की कोशिश करे और बहुत पहले किए गए कार्यों को रद्द करने का प्रयास करे… सरकार उन दशकों पुराने लेन-देन को मिटाने के लिए न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती, ताकि उन जमीनों पर दावा किया जा सके जो अब निर्दोष नागरिकों के कब्जे में हैं।”
बुनियादी सुविधाओं के संबंध में कोर्ट ने कहा:
“ऐसे विला और फ्लैटों में रहने वाले लोगों को राज्य अधिकारियों द्वारा बुनियादी सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता। अधिकारियों के लिए यह उचित नहीं है कि वे प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं में देरी करें ताकि वहां के निवासियों को मौलिक सुविधाओं से दूर रखा जा सके।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार 2019 के यथास्थिति आदेश का फायदा उठाकर मामले को खींच रही है और उन नागरिकों की दुर्दशा की अनदेखी कर रही है जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई घरों पर खर्च की है।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- यथास्थिति का आदेश रद्द: 21 अक्टूबर 2019 को दिया गया यथास्थिति का अंतरिम आदेश तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है।
- समय सीमा का निर्धारण: कोर्ट ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अपनी समीक्षा पूरी करने के लिए चार महीने और राज्य सरकार को उनकी सिफारिशों पर कार्रवाई के लिए अतिरिक्त दो महीने का समय दिया है।
- तीसरे पक्ष के हितों की सुरक्षा: सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह दशकों से बने तीसरे पक्ष के हितों को ध्यान में रखे और कानूनी दायरे में रहकर निर्णय ले।
- याचिकाओं का निपटारा: कासाग्रैंड बिल्डर की याचिका खारिज कर दी गई क्योंकि जांच पहले से ही जारी है। वहीं, सी.ई. सत्यनारायण रेड्डी की याचिका को 403 दिनों की देरी के कारण खारिज कर दिया गया।
- अवमानना याचिका खारिज: यथास्थिति के आदेश के उल्लंघन के आरोपों वाली अवमानना याचिका को ‘पल्लव शेठ बनाम कस्टोडियन एवं अन्य (2001)’ के मामले का हवाला देते हुए समय सीमा (limitation) के आधार पर खारिज कर दिया गया।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: सचिव, तमिलनाडु सरकार और अन्य बनाम एस. राजा और अन्य
- केस संख्या: विशेष अनुमति याचिका (सी) संख्या 24430-24431/2019 (संबद्ध मामलों के साथ)
- पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
- दिनांक: 22 अप्रैल, 2026

