गवाह की दोबारा जांच अभियोजन पक्ष की कमियों को भरने के लिए नहीं की जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन साल पुराने मामले में गवाह को फिर से बुलाने की याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर एक आवेदन को खारिज कर दिया है। इस याचिका में एक निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के तीन साल बाद एक मुख्य गवाह को फिर से बुलाने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 311 (जो अब BNSS में भी लागू है) के तहत किसी गवाह को वापस बुलाने की शक्ति का उपयोग अत्यधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए और इसका उपयोग अभियोजन पक्ष की कमियों को भरने या विरोधाभासों को सुधारने के लिए नहीं किया जा सकता है।

कानूनी मुद्दा

यह आवेदन श्रीमती रामवती (मृतक की माँ) द्वारा दायर किया गया था, जिसमें अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (चौथा), गौतम बुद्ध नगर के 10 नवंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। आवेदक ने P.W.-3, ऋषिपाल सिंह (मृतक के पिता) की दोबारा जांच की मांग की थी, जो जिरह के दौरान अपनी पिछली गवाही से पलट गए थे। हाईकोर्ट में जस्टिस नंद प्रभा शुक्ला ने निचली अदालत के गवाह को वापस बुलाने से इनकार करने के फैसले को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2019 के केस अपराध संख्या 1310 से संबंधित है, जो आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 201 (साक्ष्य मिटाना) के तहत दर्ज है। 3 सितंबर, 2019 को गौतम बुद्ध नगर जिले के एक खेत में राहुल (आवेदक का बेटा) और कुलदीप नागर के शव मिलने के बाद प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जांच के बाद सुखमीत, योगेश उर्फ ​​बच्ची और सौरभ राणा के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया था।

मुकदमे के दौरान, ऋषिपाल (P.W.-3) की मुख्य परीक्षा 23 सितंबर, 2021 को दर्ज की गई थी, जिसमें उन्होंने अभियोजन पक्ष का समर्थन किया था। हालांकि, 28 जुलाई, 2022 को हुई जिरह में उन्होंने अपनी गवाही वापस ले ली और मुकर गए। इसके बावजूद, अभियोजन पक्ष ने उस समय उन्हें पक्षद्रोही (hostile) घोषित नहीं किया और न ही दोबारा जांच की मांग की। तीन साल से अधिक समय बीतने के बाद, 14 अगस्त, 2025 को आवेदक ने ऋषिपाल को वापस बुलाने के लिए धारा 311 Cr.P.C. के तहत आवेदन किया।

पक्षों के तर्क

आवेदक की ओर से श्री सक्षम श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि गवाह ने जिरह के दौरान अपनी स्वतंत्र इच्छा से गवाही नहीं दी थी। यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने आरोपियों के साथ संबंध रखने वाले स्थानीय ग्रामीणों द्वारा दिए गए दबाव और धमकियों के कारण बयान बदले। P.W.-3 द्वारा अक्टूबर 2025 में इन दावों का समर्थन करते हुए एक हलफनामा भी दाखिल किया गया था।

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राज्य की ओर से विद्वान AGA-I श्री रतन सिंह ने इस आवेदन का विरोध किया। उन्होंने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि P.W.-3 ने 2022 में अपनी जिरह के दौरान स्पष्ट रूप से कहा था कि वह बिना किसी डर या दबाव के गवाही दे रहे हैं और उनके बयान सत्य हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने गौर किया कि यह आवेदन तीन साल से अधिक के अंतराल के बाद “अत्यधिक देरी” से दिया गया था। अदालत ने कहा कि आवेदक मृतक की माँ होने के बावजूद न तो पहली सूचनाकर्ता (informant) थीं और न ही चश्मदीद गवाह। कोर्ट ने पाया कि यह आवेदन अभियोजन पक्ष की “कमियों को भरने” और मुख्य परीक्षा व जिरह के बयानों के बीच विसंगतियों को ठीक करने का एक प्रयास प्रतीत होता है।

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राजा राम प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य और अन्य (2013) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने धारा 311 Cr.P.C. से संबंधित कई सिद्धांतों को रेखांकित किया:

  • इस शक्ति का प्रयोग केवल “न्यायसंगत निर्णय” सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए।
  • यह विवेकाधीन शक्ति है जिसका प्रयोग न्यायिक रूप से और “अत्यधिक देखभाल और सावधानी” के साथ किया जाना चाहिए।
  • अतिरिक्त साक्ष्य को “पुनर्परीक्षण के छद्म रूप” या मामले की प्रकृति बदलने के लिए स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“मुकदमा प्रगति पर है और धारा 311 Cr.P.C. के तहत आवेदन तीन साल से अधिक के अंतराल के बाद एक देरी से उठाया गया कदम है, जिसका उद्देश्य अभियोजन पक्ष की कमियों को भरना और मुख्य परीक्षा व जिरह के बीच के विरोधाभासों को सुधारने का अवसर प्राप्त करना है…”

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि न तो आवेदक और न ही गवाह ने पिछले वर्षों में अधिकारियों या ट्रायल जज के सामने धमकी या दबाव के संबंध में कोई शिकायत दर्ज कराई थी। अदालत ने माना कि इस स्तर पर गवाह की दोबारा जांच करने से “आरोपियों के प्रति गंभीर पूर्वाग्रह पैदा होगा और इसके परिणामस्वरूप न्याय की विफलता हो सकती है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत द्वारा ध्यान में रखे गए कारक उचित और न्यायसंगत थे और चुनौती दिए गए आदेश में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

“उपर्युक्त चर्चाओं के आलोक में और ऊपर निर्धारित विभिन्न सिद्धांतों को लागू करते हुए, ट्रायल कोर्ट द्वारा नोट किए गए कारक और निकाले गए निष्कर्ष सभी उपयुक्त और न्यायसंगत हैं और विवादित आदेश में किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।”

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तदनुसार, धारा 528 BNSS के तहत आवेदन खारिज कर दिया गया और ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार शीघ्रता से मुकदमा समाप्त करने का निर्देश दिया गया।

केस विवरण

केस टाइटल: श्रीमती रामवती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य

केस संख्या: APPLICATION U/S 528 BNSS No. 50778 of 2025

बेंच: जस्टिस नंद प्रभा शुक्ला

तारीख: 20 अप्रैल, 2026

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