इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि 1956 के बाद किसी हिंदू महिला के नाम पर खरीदी गई संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति (Absolute Property) होती है। कोर्ट ने एक बेटी और बेटे द्वारा अपनी मां की संपत्ति में हिस्सा मांगने वाली प्रथम अपील को खारिज करते हुए कहा कि वादी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहे कि संपत्ति हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के फंड से खरीदी गई थी।
जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि संपत्ति की खरीद के लगभग 60 साल बाद दायर किया गया यह मुकदमा “पूरी तरह से समय-बाधित (Barred by limitation)” है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता श्रीमती सुनीता गुप्ता और उनके भाई ने अपनी मां श्रीमती प्रेम गुप्ता और बहन श्रीमती अंजू गुप्ता के खिलाफ मूल वाद (O.S. No. 59 of 2025) दायर किया था। उन्होंने आगरा स्थित दो संपत्तियों को HUF संपत्ति घोषित करने की मांग की थी, जिन्हें 1966 में उनकी मां के नाम पर पंजीकृत किया गया था।
वादियों का तर्क था कि उनके पिता ओमप्रकाश गुप्ता एक सरकारी सेवक थे और उन्होंने अपने पिता (दादा बाबूलाल गुप्ता) के पैतृक व्यवसाय “आढ़त” के फंड का उपयोग करके ये संपत्तियां खरीदी थीं। उन्होंने दावा किया कि उनकी मां एक गृहणी थीं जिनके पास अपना कोई ‘स्त्रीधन’ नहीं था, इसलिए वह संपत्ति की वास्तविक स्वामी नहीं हो सकतीं। उनका आरोप था कि विवाद तब शुरू हुआ जब उनकी मां ने सितंबर 2022 से किराए का हिस्सा देना बंद कर दिया और संपत्ति बेचने की धमकी दी।
आगरा की ट्रायल कोर्ट ने आदेश VII नियम 11 CPC के तहत वादी के दावे को खारिज कर दिया था, जिसके विरुद्ध यह अपील हाईकोर्ट में दायर की गई थी।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं के वकील: अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि आदेश VII नियम 11 के चरण में कोर्ट को केवल वाद पत्र (Plaint) में कही गई बातों को ही सच मानना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करके और समय-सीमा (Limitation) के मुद्दे को बिना पूर्ण सुनवाई के तय करके गलती की है।
प्रतिवादियों के वकील: प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वादियों ने HUF के अस्तित्व या उसकी आय का कोई प्रारंभिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पिता एक सरकारी कर्मचारी थे, जो कानूनी रूप से किसी व्यावसायिक गतिविधि में शामिल नहीं हो सकते थे। उन्होंने इस मुकदमे को “छद्म मुकदमेबाजी” करार दिया और कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के तहत मां ही संपत्ति की पूर्ण स्वामी हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कानूनी प्रावधानों और विभिन्न नजीर का हवाला देते हुए निम्नलिखित टिप्पणियाँ कीं:
1. संयुक्त संपत्ति की धारणा पर: अंगदी चंद्रन्ना बनाम शंकर (2025) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“सिर्फ एक संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व के आधार पर किसी संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति मानने की कोई धारणा नहीं है। जो व्यक्ति ऐसा दावा करता है, उसे ही साबित करना होगा कि संपत्ति संयुक्त परिवार की है।”
कोर्ट ने पाया कि 1966 के बिक्री विलेख (Sale Deed) में स्पष्ट रूप से मां का नाम पूर्ण स्वामी के रूप में दर्ज था और यह भी उल्लेख था कि भुगतान उनकी ओर से किया गया था।
2. पिता की सरकारी सेवा पर: कोर्ट ने वादियों के दावों में विरोधाभास पाया कि उनके पिता सरकारी पद पर रहते हुए किसी व्यावसायिक HUF के सदस्य कैसे हो सकते थे। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“एक सरकारी सेवक सरकारी सेवा में रहते हुए किसी व्यवसाय का हिस्सा नहीं हो सकता।”
3. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14: कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अधिनियम लागू होने के बाद खरीदी गई संपत्ति पर महिला का पूर्ण अधिकार होता है। कोर्ट के अनुसार:
“यह स्पष्ट है कि धारा 14 के तहत हिंदू महिला द्वारा खरीदी गई संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति होगी, न कि सीमित स्वामित्व वाली।”
4. समय-सीमा और “चतुराई भरी ड्राफ्टिंग” (Clever Drafting): कोर्ट ने वादियों के उस तर्क को खारिज कर दिया कि समय-सीमा का मुद्दा केवल ट्रायल के बाद तय होना चाहिए। श्री मुकुंद भवन ट्रस्ट (2024) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“जहाँ वाद पत्र से यह स्पष्ट हो कि मुकदमा समय-सीमा से बाहर है, वहाँ अदालतों को राहत देने में संकोच नहीं करना चाहिए और पक्षों को दोबारा ट्रायल में नहीं झोंकना चाहिए।”
कोर्ट ने नोट किया कि वादी (अब 61 और 58 वर्ष के) बालिग होने के बाद भी दशकों तक चुप रहे। कोर्ट ने किराए के विवाद को केवल समय-सीमा के भीतर आने के लिए गढ़ा गया एक “कृत्रिम तथ्य” बताया।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि वादी संपत्ति में अपना कोई अधिकार या हित साबित करने में विफल रहे। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि मुकदमा “स्पष्ट रूप से परेशान करने वाला, योग्यताहीन और समय-बाधित” है। इसके साथ ही कोर्ट ने अपील को प्रारंभिक स्तर पर ही हर्जाने के साथ खारिज कर दिया।
केस विवरण:
केस का शीर्षक: श्रीमती सुनीता गुप्ता एवं अन्य बनाम श्रीमती प्रेम गुप्ता एवं 2 अन्य
केस संख्या: प्रथम अपील संख्या 277 वर्ष 2026
पीठ: न्यायमूर्ति संदीप जैन
दिनांक: 16.04.2026

