बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर बेंच) ने एक पति द्वारा दायर रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पत्नी को दिए जाने वाले अंतरिम भरण-पोषण की राशि को 1,00,000 रुपये से घटाकर 75,000 रुपये प्रति माह कर दिया है। जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 की धारा 24 के तहत ‘पेंडेंट लाइट’ (मुकदमे के दौरान) भरण-पोषण का निर्धारण करते समय कोर्ट को केवल पक्षों की “आय” पर विचार करना चाहिए, न कि उन “निष्क्रिय संपत्तियों” या पूंजीगत संपत्तियों पर जो राजस्व उत्पन्न नहीं करती हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का विवाह 27 नवंबर, 2004 को हुआ था। मार्च 2019 में, पति ने पत्नी के विवाहेतर संबंधों का पता चलने का आरोप लगाया, जिसके बाद दोनों अलग हो गए। इसके बाद, पति ने HMA की धारा 13(1)(i) और (ia) के तहत तलाक के लिए याचिका दायर की, जबकि पत्नी ने धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की।
तलाक की कार्यवाही के दौरान, पत्नी ने धारा 24 के तहत 5 लाख रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण के लिए आवेदन किया। 13 मार्च, 2023 को फैमिली कोर्ट नंबर 3, नागपुर ने पति को 1,00,000 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण और 25,000 रुपये मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता (पति): पति के वकील श्री ऋषि भार्गव ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट रजनीश बनाम नेहा के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अनिवार्य प्रकटीकरण (disclosure) आवश्यकताओं का पालन करने में विफल रहा। उन्होंने तर्क दिया कि कोर्ट ने धारा 24 के तहत “अंतरिम भरण-पोषण” के लिए धारा 25 के तहत “स्थायी गुजारा भत्ता” के मानकों को गलत तरीके से लागू किया।
उन्होंने आगे कहा कि पति की कुल वार्षिक आय लगभग 20 लाख रुपये है और वह यूनाइटेड किंगडम में अपने बच्चों की शिक्षा के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ‘नर्मदा कैटरर्स’ के नाम से कैटरिंग का व्यवसाय चला रही थी और 20,000 रुपये प्रति माह कमा रही थी।
प्रतिवादी (पत्नी): पत्नी की ओर से पेश वकील श्री रितेश बढ़े ने तर्क दिया कि वह पति के समान जीवन स्तर की हकदार है, जो अक्सर विदेश यात्रा करता है और कई कंपनियों में हिस्सेदारी रखता है। उन्होंने पत्नी के कैटरिंग व्यवसाय चलाने से इनकार करते हुए कहा कि यह उसके भाई का है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि एक अन्य दीवानी मामले में पति द्वारा महंगी संपत्ति खरीदने की इच्छा दिखाना यह दर्शाता है कि उसके पास पर्याप्त साधन हैं।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने धारा 24 (अंतरिम भरण-पोषण) और धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता) के बीच कानूनी अंतर पर ध्यान केंद्रित किया। जस्टिस चांदवानी ने टिप्पणी की:
“1955 के अधिनियम की धारा 24 और 25 के तहत निर्धारित कानून के बीच का अंतर स्पष्ट और असंदिग्ध है। धारा 24 में ‘आय’ (income) शब्द का उपयोग किया गया है, जबकि धारा 25 में ‘आय और संपत्ति’ (income and property) दोनों शब्दों का उपयोग किया गया है। 1955 के अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण की राशि पर विचार करते समय, केवल आय पर विचार किया जाना चाहिए, न कि संपत्ति या पूंजीगत स्रोत पर।”
कलकत्ता हाईकोर्ट के गीता चटर्जी बनाम प्रभात कुमार चटर्जी मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने नोट किया कि “पेड़ के फल आय हैं, न कि पेड़।” कोर्ट ने जोर दिया कि जो निष्क्रिय संपत्ति आय उत्पन्न नहीं करती है, उसे अंतरिम सहायता की गणना में शामिल नहीं किया जा सकता है।
पति की आय के संबंध में, कोर्ट ने पाया कि व्यक्तिगत आयकर रिटर्न में 20 लाख रुपये की आय दिखाई गई है, लेकिन उसकी आम्रपाली बार एंड रेस्टोरेंट और मोटल आम्रपाली प्राइवेट लिमिटेड जैसी विभिन्न कंपनियों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी (90% या अधिक) है। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्तिगत आयकर रिटर्न में दिखाई गई आय के अलावा, याचिकाकर्ता के पास कंपनियों से पर्याप्त आय है जिससे वह प्रतिवादी को भरण-पोषण की राशि का भुगतान कर सके।”
हालांकि, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादी अपने द्वारा दावा किए गए 5 लाख रुपये के मासिक खर्च का विस्तृत विवरण देने में विफल रही।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि बच्चों की विदेशी शिक्षा के प्रति पति की जिम्मेदारी और पत्नी की आवश्यक जरूरतों को देखते हुए, 2,500 रुपये प्रतिदिन (कुल 75,000 रुपये प्रति माह) की राशि याचिका के लंबित रहने के दौरान प्रतिवादी की सहायता के लिए उचित होगी।
कोर्ट ने 25,000 रुपये के मुकदमेबाजी खर्च को बरकरार रखा। यह स्पष्ट किया गया कि ये टिप्पणियां केवल धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण तय करने की सीमा तक प्रथम दृष्टया (prima facie) प्रकृति की हैं।
केस विवरण:
केस शीर्षक: सचिन बनाम हर्षदा अग्ने
केस संख्या: रिट याचिका संख्या 2210/2023
पीठ: जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी
दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

