सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी अनुबंध (Contract) के आर्बिट्रेशन क्लॉज में ‘Can’ (सकता है) शब्द का उपयोग किया गया है, तो यह विवादों को अनिवार्य रूप से मध्यस्थता (Arbitration) के लिए भेजने के लिए बाध्य नहीं करता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसी शब्दावली केवल भविष्य में मध्यस्थता की संभावना को दर्शाती है, न कि किसी अनिवार्य दायित्व को। इसका अर्थ है कि पक्षकारों के पास सिविल कोर्ट सहित विवाद समाधान के अन्य कानूनी रास्ते खुले रहेंगे।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, नाग्रीका इंडकॉन प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड, जो एल्यूमीनियम फॉयल कंटेनर बनाती है, ने प्रतिवादी कार्गोकेयर लॉजिस्टिक्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड के साथ दक्षिण कैरोलिना, यूएसए में माल परिवहन के लिए अनुबंध किया था। छह में से पांचवें कंटेनर की डिलीवरी को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब अपीलकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी ने भुगतान प्राप्त किए बिना या मूल ‘बिल ऑफ लैडिंग’ (Bill of Lading) के बिना ही माल खरीदार को सौंप दिया। इससे अपीलकर्ता को 28,064.86 अमेरिकी डॉलर का वित्तीय नुकसान हुआ।
बिल ऑफ लैडिंग की धारा 25 में विवाद समाधान तंत्र का उल्लेख इस प्रकार था:
“इसके तहत किसी भी मतभेद या विवाद को भारत में या किसी पारस्परिक रूप से सहमत स्थान पर मध्यस्थता (Arbitration) द्वारा हल किया जा सकता है (Can be settled), जिसमें प्रत्येक पक्ष एक मध्यस्थ नियुक्त करेगा।”
जब अपीलकर्ता ने मध्यस्थता शुरू करने के लिए नोटिस भेजा, तो प्रतिवादी ने इसे अनिवार्य मानने से इनकार कर दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मध्यस्थ नियुक्त करने के अपीलकर्ता के आवेदन (धारा 11) को खारिज कर दिया, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता के तर्क:
- आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 7 समझौते के लिए किसी विशेष प्रारूप को अनिवार्य नहीं बनाती है।
- क्लॉज के शीर्षक में ‘Arbitration’ शब्द का होना और क्लॉज को शामिल करना ही मध्यस्थता की स्पष्ट मंशा दर्शाता है।
- विद्या ड्रोलिया बनाम दुर्गा ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि संदेह की स्थिति में अदालतों को मध्यस्थता के पक्ष में झुकना चाहिए।
प्रतिवादी के तर्क:
- धारा 25 मध्यस्थता के लिए किसी निश्चित समझौते को व्यक्त नहीं करती है।
- जगदीश चंद्र बनाम रमेश चंद्र मामले के आधार पर तर्क दिया गया कि ‘Can’ जैसे शब्द बाध्यकारी समझौते का गठन नहीं करते।
- यह क्लॉज तकनीकी रूप से भी अधूरा है क्योंकि इसमें तीसरे मध्यस्थ (Presiding Arbitrator) की नियुक्ति का प्रावधान नहीं है, जो एक्ट की धारा 10 का उल्लंघन है।
कोर्ट का विश्लेषण
अदालत ने अपना पूरा ध्यान ‘Can’ शब्द की व्याख्या पर केंद्रित किया। पीठ ने नोट किया कि जहां ‘Shall’ (होगा/अनिवार्य) एक जनादेश देता है और ‘May’ (सकता है) अक्सर विवेक (Discretion) को दर्शाता है, वहीं ‘Can’ केवल “क्षमता, योग्यता या तथ्यात्मक संभावना” को संदर्भित करता है।
संविदात्मक व्याख्या पर: कोर्ट ने कहा कि लिखित शब्द ही कानूनी दायित्व का आधार होते हैं। बिना किसी ठोस मंशा के किसी दायित्व को थोपना पक्षकारों की स्वायत्तता (Party Autonomy) से समझौता करना होगा। पीठ ने टिप्पणी की:
“पक्षकारों की आपसी मंशा अपने मतभेदों को मध्यस्थता के लिए भेजने की होनी चाहिए, क्योंकि सहमति ही पक्षकारों पर आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के क्षेत्राधिकार का स्रोत है।”
क्लॉज की वैधता पर: कोर्ट ने के.के. मोदी बनाम के.एन. मोदी में निर्धारित आर्बिट्रेशन समझौते की आवश्यकताओं का उल्लेख किया। सबसे महत्वपूर्ण रूप से, जगदीश चंद्र बनाम रमेश चंद्र मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“कोई भी समझौता या क्लॉज जिसमें मध्यस्थता के संदर्भ से पहले भविष्य की सहमति या सर्वसम्मति की आवश्यकता हो, वह आर्बिट्रेशन समझौता नहीं है, बल्कि भविष्य में आर्बिट्रेशन समझौते में प्रवेश करने का एक समझौता मात्र है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ‘Can’ का उपयोग और मध्यस्थों की नियुक्ति की अधूरी प्रक्रिया यह दर्शाती है कि पक्षकार मध्यस्थता को अनिवार्य बनाने के विषय पर एकमत (Ad Idem) नहीं थे।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 25 केवल विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने की एक इच्छा या उम्मीद को दर्शाती है।
“इस अपील में विवादित क्लॉज केवल विवादों को मध्यस्थता के लिए भेजने की भविष्य की संभावना को दर्शाता है और इसे बाध्यकारी आर्बिट्रेशन समझौता नहीं कहा जा सकता।”
कोर्ट ने अपील को योग्यताहीन पाते हुए खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि अनिवार्य समझौते की अनुपस्थिति में किसी पक्ष को मध्यस्थता के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: नाग्रीका इंडकॉन प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम कार्गोकेयर लॉजिस्टिक्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (@ SLP (C) संख्या 19026 / 2023)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
- दिनांक: 17 अप्रैल, 2026

