CrPC की धारा 311 के तहत गवाह को दोबारा बुलाने का इस्तेमाल सबूतों को फिर से खोलने के लिए नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने नई ‘चीफ एग्जामिनेशन’ की अनुमति देने से किया इनकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें एक शिकायतकर्ता को केवल जिरह (cross-examination) के लिए दोबारा बुलाने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 311 का उपयोग अभियोजन पक्ष के मामले को फिर से खोलने के लिए नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब मूल साक्ष्य दर्ज होने के एक दशक बाद नई गवाही पेश करने की कोशिश की जा रही हो। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि इतने विलंबित चरण में नई ‘एग्जामिनेशन-इन-चीफ’ की अनुमति देने से आरोपी के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और इससे उन आरोपों को शामिल करने का मौका मिल जाएगा जो मूल रिकॉर्ड में नहीं थे।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मीनाक्षी गौतम और प्रतिवादी नंबर 2 का विवाह साल 2004 में हुआ था। 2006 में मारपीट के आरोपों के बाद, बैंगलोर में IPC की धारा 498A, 323 और 506 के तहत एक FIR (संख्या 312/2006) दर्ज की गई थी। 2008 में चार्जशीट दाखिल हुई और बैंगलोर की अदालत के सामने याचिकाकर्ता की एग्जामिनेशन-इन-चीफ 12 अप्रैल 2012 और 24 मई 2014 को दो अलग-अलग तारीखों पर दर्ज की गई।

2014 की सुनवाई के बाद मामला जिरह के लिए स्थगित कर दिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने आगे की जांच के लिए CrPC की धारा 173(8) के तहत आवेदन सहित विभिन्न याचिकाएं दायर कीं, जो अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचीं। 28 जनवरी 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने आगे की जांच के कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि यह अनुरोध काफी विलंबित था और शिकायतकर्ता द्वारा “अपने शुरुआती बयान में सुधार करने” की कोशिश लग रही थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी शिकायतों के निवारण के लिए CrPC की धारा 311 के तहत आवेदन करने की छूट दी थी।

बाद में मामला दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। गैर-हाजिरी के कारण याचिकाकर्ता को गवाह के तौर पर हटा दिया गया था, जिसके बाद अभियोजन पक्ष ने धारा 311 के तहत आवेदन दिया। ट्रायल कोर्ट ने गवाह को वापस बुलाने की अनुमति तो दी, लेकिन इसे केवल जिरह (cross-examination) तक सीमित रखा।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने दोबारा एग्जामिनेशन-इन-चीफ की अनुमति न देकर गलती की है। उनका दावा था कि क्रूरता की कई घटनाएं बैंगलोर में ठीक से दर्ज नहीं की गई थीं क्योंकि कार्यवाही कन्नड़ भाषा में आयोजित की गई थी, जिसे याचिकाकर्ता नहीं समझती थी। यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई छूट केवल जिरह तक सीमित नहीं थी और पूर्ण साक्ष्य पेश करने के लिए आगे की गवाही आवश्यक थी।

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प्रतिवादी की दलीलें: प्रतिवादी नंबर 2 के वकील ने तर्क दिया कि एग्जामिनेशन-इन-चीफ पहले ही दो मौकों पर विस्तार से दर्ज की जा चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता केवल अपने ससुर और देवर के खिलाफ “नए और झूठे आरोप” लगाने के लिए दोबारा गवाही देना चाहती है, जिनका नाम 2012 और 2014 में दर्ज बयानों में नहीं था। उनका कहना था कि ट्रायल कोर्ट का आदेश संतुलित है और बचाव पक्ष के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

कोर्ट ने कहा कि धारा 311 के तहत शक्ति का प्रयोग स्थापित कानूनी मापदंडों के अनुसार किया जाना चाहिए। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने नोट किया कि याचिकाकर्ता की गवाही पहले से ही रिकॉर्ड का हिस्सा है और भाषा का मुद्दा “कई वर्षों के बीतने के बाद एक विलंबित चरण” में उठाया जा रहा है।

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इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट की पिछली टिप्पणियों (रामपाल गौतम बनाम राज्य) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि शीर्ष अदालत ने पहले ही FIR और 2012 के बयान में ससुराल वालों के खिलाफ आरोपों की अनुपस्थिति पर गौर किया था।

धारा 311 के दायरे के बारे में जस्टिस शर्मा ने कहा:

“इस अदालत का विचार है कि इस स्तर पर आगे की एग्जामिनेशन-इन-चीफ की अनुमति देने का प्रभावी अर्थ उन साक्ष्यों को फिर से खोलना होगा जो एक दशक से अधिक समय पहले, यानी 2012 और 2014 में दर्ज किए गए थे। साक्ष्य को इस तरह फिर से खोलना, विशेष रूप से तब जब याचिकाकर्ता पहले ही गवाह के तौर पर पेश हो चुकी थी और उसकी गवाही दो मौकों पर दर्ज की जा चुकी थी, सामान्य रूप से तब तक अनुमति नहीं दी जा सकती जब तक कि कोई ठोस परिस्थितियां न दिखाई जाएं।”

कोर्ट ने आगे कहा:

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“इस अदालत की राय में, विद्वान ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 311 के तहत अपने विवेक का प्रयोग विवेकपूर्ण तरीके से किया है। शिकायतकर्ता को जिरह के लिए वापस बुलाने की अनुमति देकर, ट्रायल कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि पहले से दर्ज गवाही पर विचार किया जा सके और साथ ही आरोपी के अधिकारों की रक्षा भी की जा सके। दूसरी ओर, इस स्तर पर नए सिरे से एग्जामिनेशन-इन-चीफ की अनुमति देना अभियोजन पक्ष के मामले को फिर से खोलने और याचिकाकर्ता को उन आरोपों को शामिल करने की अनुमति देने जैसा होगा जो FIR या अतीत में दो मौकों पर दर्ज की गई गवाही का हिस्सा नहीं थे।”

निर्णय

हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट के 11 मार्च 2026 के आदेश में कोई खामी या अवैधता नहीं मिली। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता को जिरह के उद्देश्य से वापस बुलाने की अनुमति देकर एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है, क्योंकि मामला पहले इसी स्तर पर लंबित था। इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।

केस विवरण:

केस टाइटल: मीनाक्षी गौतम बनाम राज्य (NCT दिल्ली) व अन्य

केस नंबर: CRL.M.C. 2325/2026 और CRL.M.A. 9469/2026

बेंच: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

तारीख: 15 अप्रैल 2026

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