सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में झारखंड हाईकोर्ट और बोकारो की फैमिली कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा है, जिसके तहत पति को क्रूरता (Cruelty) और परित्याग (Desertion) के आधार पर तलाक की डिक्री दी गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि निचली अदालतों द्वारा साक्ष्यों के उचित विश्लेषण के बाद तय किए गए तथ्यों में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए पत्नी को दी जाने वाली एकमुश्त राशि के स्थान पर मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।
कानूनी मुद्दा और परिणाम
इस मामले का मुख्य कानूनी पक्ष हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(ib) के तहत मिली तलाक की डिक्री की वैधता पर आधारित था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी-पति ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के माध्यम से क्रूरता और परित्याग के आरोपों को साबित किया है। अदालत ने विवाह विच्छेद के फैसले को कायम रखा, लेकिन अपीलकर्ता-पत्नी की वित्तीय सुरक्षा को देखते हुए गुजारा भत्ते की प्रकृति में बदलाव किया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता (पत्नी) और प्रतिवादी (पति) का विवाह 24 फरवरी 2002 को बोकारो, झारखंड में हुआ था। वैवाहिक जीवन के दौरान उनके दो बच्चे हुए। पति ने 2018 में तलाक की याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया था कि पत्नी का व्यवहार उनके और उनके माता-पिता के प्रति अपमानजनक था और वह अलग रहने की जिद करती थी। दूसरी ओर, पत्नी ने दहेज प्रताड़ना के आरोप लगाए और कहा कि पति ने उसे मानसिक रूप से अस्थिर दिखाने के लिए जबरन मनोचिकित्सक से जांच करवाई।
बोकारो की फैमिली कोर्ट ने 23 नवंबर 2022 को तलाक की डिक्री जारी की थी, जिसे 4 अक्टूबर 2023 को झारखंड हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था।
अदालत में प्रस्तुत साक्ष्य
निचली अदालतों ने अपने निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए निम्नलिखित साक्ष्यों को आधार बनाया:
- बच्चों की गवाही: दंपत्ति के बेटे ने अपनी गवाही में क्रूरता के आरोपों का समर्थन किया और अपनी मां के साथ रहने से इनकार कर दिया।
- पत्नी का बयान: कोर्ट ने गौर किया कि पत्नी ने स्वयं यह बयान दिया था कि वह नहीं चाहती कि बच्चे उसके साथ रहें।
- पूर्व में दिया गया हलफनामा: हाईकोर्ट ने 2017 के एक दस्तावेज का हवाला दिया जिसमें अपीलकर्ता ने सास द्वारा प्रताड़ना की शिकायत के बाद भविष्य में सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने का वादा किया था।
- सुधारात्मक कदम का अभाव: फैमिली कोर्ट ने पाया कि अलग होने के बाद पत्नी ने न तो वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) की मांग की और न ही बच्चों की कस्टडी के लिए कोई कदम उठाया।
कोर्ट का विश्लेषण: तथ्यों के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विश्लेषण में इस सिद्धांत पर जोर दिया कि यदि निचली अदालतों के निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित हैं और उनमें कोई ‘विपरीतता’ (Perversity) नहीं है, तो उनमें हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा:
“रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, हमारी यह राय है कि निचली अदालतों द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष साक्ष्यों के मूल्यांकन पर आधारित तथ्यात्मक निष्कर्ष हैं। इस अदालत द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता वाली किसी भी प्रकार की विपरीतता (Perversity) प्रदर्शित नहीं की गई है।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि 2018 से दोनों पक्ष अलग रह रहे हैं, जो दर्शाता है कि वैवाहिक बंधन अब पूरी तरह टूट चुका है और सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
अंतिम निर्णय: वित्तीय सहायता में संशोधन
तलाक को बरकरार रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को मिलने वाली आर्थिक सहायता पर पुनर्विचार किया। फैमिली कोर्ट ने पति को ₹6,00,000 की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया था।
निरंतर वित्तीय सहायता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को बदलते हुए कहा:
“पूर्ण न्याय के हित में हम यह उचित समझते हैं कि प्रतिवादी को इस आदेश की तिथि से अपीलकर्ता को ₹10,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया जाए।”
अदालत ने इसी के साथ अपील का निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस का नाम: ममता देवी बनाम संजय कुमार
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (@ SLP (C) No. 20325/2024)
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता
- दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

