NCLT के ‘कार्यकारी अध्यक्ष’ की नियुक्ति पर विवाद: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में बच्चू वेंकट बलराम दास की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। ट्रिब्यूनल के तकनीकी सदस्य कौशलेंद्र कुमार सिंह द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह नियुक्ति वैधानिक वरिष्ठता नियमों की अनदेखी कर की गई है।

जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओ.पी. शुक्ला की बेंच ने केंद्र सरकार और दास (ट्रिब्यूनल के न्यायिक सदस्य) को नोटिस जारी कर चार दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता के मामले में “प्रथम दृष्टया सार” (prima facie substance) नजर आता है।

यह कानूनी विवाद इस सवाल पर आधारित है कि क्या NCLT के प्रमुख का पद केवल न्यायिक सदस्य को मिलना चाहिए या ट्रिब्यूनल के सबसे वरिष्ठ सदस्य को। याचिकाकर्ता कौशलेंद्र कुमार सिंह की नियुक्ति 1 अक्टूबर, 2021 को तकनीकी सदस्य के रूप में हुई थी। इसके विपरीत, बच्चू वेंकट बलराम दास ने 18 अक्टूबर, 2021 को न्यायिक सदस्य के रूप में कार्यभार संभाला था—जो याचिकाकर्ता से लगभग दो सप्ताह बाद की तारीख है।

16 मार्च को पूर्व अध्यक्ष की सेवानिवृत्ति के बाद, केंद्र ने 17 मार्च को दास को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। सरकार ने इस कदम का बचाव करते हुए “परंपरा” का हवाला दिया, जिसके तहत आमतौर पर वरिष्ठतम न्यायिक सदस्य को ही यह जिम्मेदारी दी जाती है। हालांकि, याचिकाकर्ता का तर्क है कि कानून स्पष्ट रूप से “वरिष्ठतम सदस्य” की नियुक्ति का आदेश देता है, चाहे वह न्यायिक हो या तकनीकी।

सुनवाई के दौरान बेंच ने लिखित कानून के ऊपर “परंपरा” को प्राथमिकता देने पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कानून (statute) लागू है, तो उसका पालन सख्ती से किया जाना चाहिए।

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बेंच ने कहा, “यदि कानून कहता है कि वरिष्ठतम सदस्य को नियुक्त किया जाना है और वह (याचिकाकर्ता) वर्तमान कार्यकारी अध्यक्ष से पहले नियुक्त हुए हैं… तो उनके वरिष्ठ होने के दावे में प्रथम दृष्टया दम है।”

जजों ने आगे स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता वास्तव में वरिष्ठतम सदस्य हैं, तो उनका तकनीकी सदस्य होना वर्तमान कानून के तहत अप्रासंगिक है। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “यदि यह कानून के उल्लंघन में है, तो हम न्यायिक सदस्यों को ही कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करने की किसी भी ‘प्रथा’ को जारी रखने की अनुमति नहीं देंगे।”

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याचिकाकर्ता ने इससे पहले मार्च में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन बाद में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) जाने के लिए याचिका वापस ले ली थी। हालांकि, CAT ने इस मामले पर अपने अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) से इनकार कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता को फिर से हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

मामले के महत्व को देखते हुए हाईकोर्ट ने इसे 20 अप्रैल को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

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