इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन पर दिल्ली स्थित सरकारी आवास से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के आरोप लगे थे, जिसके बाद से वे पिछले एक साल से विवादों में थे और उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही की संभावना भी बनी हुई थी।
जस्टिस वर्मा ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दिया है। यह कदम उन्होंने तब उठाया जब वे ‘जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968’ के तहत गठित एक उच्च-स्तरीय संसदीय समिति की जांच का सामना कर रहे थे। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, जिससे उनकी कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई थीं।

आगजनी के दौरान मिला था नोटों का ढेर
इस पूरे मामले की शुरुआत मार्च 2024 में हुई थी, जब दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकल कर्मियों और पुलिस अधिकारियों को वहां कथित तौर पर नकदी के ढेर मिले। रिपोर्टों के अनुसार, कमरे में रखे नोटों की गड्डियों की ऊंचाई करीब 1.5 फीट तक थी। घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने मामले का संज्ञान लिया और जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था।
जस्टिस वर्मा का पक्ष और सुरक्षा पर सवाल
जस्टिस वर्मा ने शुरू से ही इन आरोपों को निराधार बताया है। संसदीय पैनल के सामने उन्होंने तर्क दिया कि उनके आवास से कोई नकदी बरामद नहीं हुई थी। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने पैनल से कहा, “अगर अधिकारी घटना स्थल को सुरक्षित करने में विफल रहे, तो इसके लिए मुझे दोषी क्यों ठहराया जाना चाहिए? पुलिस और दमकल विभाग के अधिकारियों ने नियमानुसार कार्रवाई नहीं की।”
उनका मुख्य तर्क यह था कि आग लगने के समय वे घर पर मौजूद नहीं थे और साइट का नियंत्रण प्रशासन के पास था, इसलिए किसी भी चूक के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कानूनी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट का रुख
अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इन आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस पैनल में शामिल हैं:
- जस्टिस अरविंद कुमार (सुप्रीम कोर्ट)
- जस्टिस मनिंदर मोहन (मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश)
- बी.वी. आचार्य (वरिष्ठ अधिवक्ता)
जस्टिस वर्मा ने इस समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि चूंकि राज्यसभा के उपसभापति ने पहले ही उन्हें हटाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, इसलिए यह नई जांच अवैध है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और संसदीय समिति को जांच जारी रखने की अनुमति दी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक पूर्व इन-हाउस जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाया था कि जिस कमरे में कथित तौर पर नकदी मिली थी, उस पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का पूरा नियंत्रण था। संसदीय जांच के बढ़ते दबाव और महाभियोग की आहट के बीच अब जस्टिस वर्मा ने पद छोड़ने का निर्णय लिया है।

