सबरीमाला मामला: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- धार्मिक परंपराएं न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर; ‘संवैधानिक नैतिकता’ पर जताई आपत्ति

केंद्र सरकार ने मंगलवार को धार्मिक स्वायत्तता का पुरजोर समर्थन करते हुए सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखा। केंद्र ने स्पष्ट किया कि केरल के सबरीमाला मंदिर में रजस्वला आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध “धार्मिक आत्म-समझ” (religious self-understanding) का मामला है और यह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि जब तक कोई धार्मिक प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य का उल्लंघन नहीं करती है—जैसे कि मानव बलि—तब तक न्यायपालिका को किसी विश्वास-आधारित परंपरा की “तार्किकता” या “आधुनिकता” की जांच करने के लिए हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मेहता ने जोर देकर कहा कि संविधान उन मान्यताओं और अनुष्ठानों की रक्षा करता है जो धर्मनिरपेक्ष मानकों, तर्क या उपयोगिता के अनुरूप नहीं भी हो सकते हैं।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “हमें प्रत्येक संप्रदाय की प्रथा का सम्मान करना होगा; हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से संबंधित नहीं होती।” अन्य धर्मों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “अगर मैं किसी मज़ार या गुरुद्वारे में जाता हूँ और मुझे अपना सिर ढंकना पड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद छीन ली गई है।”

केंद्र ने शीर्ष अदालत को समीक्षा के ऐसे मॉडल को अपनाने के प्रति आगाह किया जो यह निर्धारित करने की कोशिश करता है कि क्या कोई प्रथा “वैज्ञानिक रूप से बचाव योग्य” है या “न्यायिक संवेदनाओं के लिए स्वीकार्य” है। केंद्र के अनुसार, ऐसी जांच धार्मिक विश्वास के स्थान पर न्यायिक दर्शन को प्रतिस्थापित कर देगी।

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केंद्र के तर्कों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा “संवैधानिक नैतिकता” (constitutional morality) के सिद्धांत पर केंद्रित था। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि यह शब्द संविधान में मूल रूप से मौजूद नहीं है और यह एक “अस्पष्ट और अनिश्चित” अवधारणा बनी हुई है।

केंद्र ने अपने प्रतिवेदन में कहा, “नैतिकता शब्द का विस्तार—जिसका संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख है—’संवैधानिक नैतिकता’ को शामिल करने के लिए करना न केवल न्यायिक अतिरेक है, बल्कि संविधान में संशोधन के समान है।”

सरकार ने धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने में कोर्ट के हस्तक्षेप से जुड़े जोखिमों को भी रेखांकित किया। केंद्र ने कहा कि भारत एक बहुलवादी समाज है जहाँ प्रत्येक धर्म और संप्रदाय की अपनी अनूठी पूजा पद्धतियां हैं, और न्यायपालिका के पास पवित्र पुस्तकों या शास्त्रों की व्याख्या करने के लिए आवश्यक “विशेषज्ञता या विद्वत्ता” नहीं है।

यह सुनवाई एक लंबी कानूनी लड़ाई का हिस्सा है जो सितंबर 2018 में शुरू हुई थी, जब पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था।

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हालांकि, नवंबर 2019 में पुनर्विचार याचिकाओं के बाद तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया। वर्तमान नौ-न्यायाधीशों की पीठ न केवल सबरीमाला मुद्दे की जांच कर रही है, बल्कि विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव से संबंधित व्यापक सवालों पर भी विचार कर रही है, जिनमें शामिल हैं:

  • मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश।
  • गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के अगियारी (पवित्र अग्नि स्थल) में प्रवेश का अधिकार।
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इस संविधान पीठ में जस्टिस बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जोयमाल्य बागची शामिल हैं। कोर्ट ने कार्यवाही की शुरुआत में ही वकीलों को समय सीमा का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया और कहा कि अन्य लंबित जरूरी मामलों के कारण अधिक समय नहीं दिया जाएगा।

मामले की सुनवाई जारी है और 22 अप्रैल तक इसके समाप्त होने की उम्मीद है। कोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के टकराव से जुड़े सात विशिष्ट प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास कर रहा है।

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