अस्पष्ट आरोप और सीसीटीवी फुटेज से बेगुनाही साबित: सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता अपार्टमेंट विवाद में आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने सजल बोस, चंडीदास जोआर्डर और सौत्रिक जोआर्डर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के अपने रिकॉर्ड का हिस्सा रहे “अकाट्य” (unimpeachable) सीसीटीवी फुटेज से यह स्पष्ट होता है कि वे कथित हमले में शामिल नहीं थे। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें इन अपीलकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया गया था, जबकि उनकी परिवार की महिलाओं को उसी मामले में बरी कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 11 अक्टूबर 2022 की रात को कोलकाता के एक अपार्टमेंट परिसर में शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता सुशील चक्रवर्ती (77 वर्षीय पूर्व लोक अभियोजक) ने आरोप लगाया था कि सौरव सेन नामक व्यक्ति ने इमारत का मुख्य दरवाजा तोड़कर जबरन प्रवेश किया। इसके बाद बिजली के मीटर बॉक्स के पास खड़ी एक स्कूटर को लेकर विवाद बढ़ गया।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि अपीलकर्ता इस विवाद में शामिल हो गए और उनके साथ मारपीट की। आरोप के अनुसार, आरोपियों ने शिकायतकर्ता के पेसमेकर (pacemaker) पर वार करने की कोशिश की और उनके परिवार के साथ भी धक्का-मुक्की और मारपीट की। इस संबंध में सर्वे पार्क पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं, जिसमें धारा 143, 323 और 354 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला) शामिल थीं, के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 8 मार्च 2024 को अपीलकर्ताओं की पत्नियों के खिलाफ कार्यवाही तो रद्द कर दी थी, लेकिन सजल बोस और अन्य अपीलकर्ताओं के खिलाफ ट्रायल जारी रखने का निर्देश दिया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने तर्क दिया कि यह कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण और केवल बदला लेने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता केवल पड़ोसियों के बीच हो रहे झगड़े को शांत कराने पहुंचे थे। उन्होंने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए कहा कि यह “स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि घटना के समय अपीलकर्ता उस स्थान पर मौजूद ही नहीं थे जहाँ कथित मारपीट हुई थी।”

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शिकायतकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि सभी आरोपियों ने एक गैर-कानूनी सभा (unlawful assembly) बनाई और बुजुर्ग शिकायतकर्ता पर हमला किया। उन्होंने एक गवाह डॉ. अपराजिता बंदोपाध्याय के धारा 164 के तहत दर्ज बयान पर भरोसा जताया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक आरोपी ने शिकायतकर्ता को जलाने की नीयत से लाइटर जलाया था।

राज्य सरकार की ओर से: पश्चिम बंगाल राज्य ने दलील दी कि जांच कानून के अनुसार की गई थी और सीसीटीवी फुटेज व मेडिकल रिपोर्ट आरोपियों की संलिप्तता का प्रथम दृष्टया प्रमाण पेश करती हैं।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्वयं सीसीटीवी फुटेज का अवलोकन किया। पीठ ने अपने फैसले में कहा:

“उक्त फुटेज के सावधानीपूर्वक और व्यापक परीक्षण के बाद यह उभर कर आता है कि अपीलकर्ता उस समय घटनास्थल पर दिखाई नहीं दे रहे हैं जब हमले की कथित घटनाएं हुई थीं… इसके विपरीत, विजुअल रिकॉर्डिंग दर्शाती है कि अपीलकर्ताओं ने स्थिति को शांत करने और विवाद को आगे बढ़ने से रोकने के प्रयास किए।”

कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट इस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का “सार्थक विश्लेषण” करने में विफल रहा। पीठ ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि लाइटर से जलाने का आरोप “सीसीटीवी फुटेज द्वारा पूरी तरह से खारिज हो जाता है, क्योंकि उसमें ऐसा कोई कृत्य दिखाई नहीं देता।”

कोर्ट ने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल (1992) और प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) के सिद्धांतों का संदर्भ देते हुए कहा:

“जहाँ आरोपी द्वारा प्रस्तुत सामग्री उच्च गुणवत्ता वाली और त्रुटिहीन है और शिकायत के आरोपों को नकारने के लिए पर्याप्त है… वहाँ हाईकोर्ट को कार्यवाही रद्द करने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।”

पीठ ने हाईकोर्ट के उस रवैये की भी आलोचना की जिसमें समान आरोपों के बावजूद कुछ आरोपियों को राहत दी गई और दूसरों को नहीं।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में मुकदमा जारी रखना “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा। कोर्ट ने कहा कि जहाँ विश्वसनीय और अकाट्य सामग्री से आरोपों का आधार ही खत्म हो जाता है, वहाँ ट्रायल चलाना न्यायिक समय की बर्बादी है।

इसके साथ ही, कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए सजल बोस, चंडीदास जोआर्डर और सौत्रिक जोआर्डर के खिलाफ दर्ज चार्जशीट और संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया।

मामले का विवरण

केस का शीर्षक: सजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य

केस संख्या: क्रिमिनल अपील (SLP(Criminal) No. 8672 of 2024 से उत्पन्न)

पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता, जस्टिस एन. वी. अंजारिया

तारीख: 06 अप्रैल, 2026

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