‘सुरक्षा का माइक्रो-मैनेजमेंट नहीं कर सकती अदालत’: अंतरधार्मिक जोड़े को 24 घंटे पुलिस प्रोटेक्शन देने से एमपी हाईकोर्ट का इनकार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रतलाम के एक अंतरधार्मिक जोड़े (interfaith couple) को चौबीसों घंटे सशस्त्र व्यक्तिगत सुरक्षा गार्ड मुहैया कराने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साफ किया है कि महज सामान्य आशंकाओं या संदिग्ध गतिविधियों के दावों के आधार पर किसी को भी स्थायी सुरक्षा नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने 14 मई को याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि भले ही संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सर्वोपरि है, लेकिन न्यायपालिका सुरक्षा एजेंसियों की जगह खुद नहीं ले सकती और न ही सुरक्षा बलों की तैनाती का सूक्ष्म-प्रबंधन (micromanage) कर सकती है।

क्या है पूरा मामला?

रतलाम शहर के रहने वाले इस जोड़े ने साल 2019 में दिल्ली के एक आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया था। याचिका के अनुसार, युवती पहले इस्लाम धर्म की अनुयायी थी और उसने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म अपनाया था।

शादी और धर्म परिवर्तन की जानकारी लड़की के परिजनों को मिलने के बाद से ही इस दंपति को उनके परिवार और अन्य लोगों से लगातार गंभीर धमकियां मिलने लगीं। खतरों को देखते हुए महिला ने पहली बार साल 2022 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

तत्कालीन अदालती आदेश के बाद रतलाम के पुलिस अधीक्षक (SP) को मामले पर विचार करने का निर्देश दिया गया था, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की थी।

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सुरक्षा हटाने के बाद पैदा हुआ नया विवाद

मामले में नया मोड़ तब आया, जब इस साल 13 अप्रैल को बिना किसी प्रशासनिक कारण के दंपति की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र गार्ड को हटा दिया गया। उसकी जगह एक होमगार्ड जवान को तैनात कर दिया गया, जिसके पास न तो कोई हथियार था और न ही मोबाइल फोन।

सुरक्षा में कटौती के तुरंत बाद, दंपति ने दावा किया कि एक अज्ञात व्यक्ति ने उनकी कार को रोकने की कोशिश की और उनके घर के आसपास एक संदिग्ध गाड़ी को मंडराते हुए देखा गया। इन ताजा घटनाओं को अपनी जान के लिए खतरा बताते हुए दंपति ने दोबारा हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर 24 घंटे व्यक्तिगत पुलिस सुरक्षा और रात के समय विशेष पहरे की मांग की। हालांकि, राज्य सरकार ने इस मांग का अदालत में कड़ा विरोध किया।

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सुरक्षा के नाम पर याचिकाओं की बाढ़ पर कोर्ट की चिंता

दोनो पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस पिल्लई ने स्पष्ट किया कि 2022 में पुलिस को याचिकाकर्ता के आवेदन पर कानूनी रूप से ‘विचार करने’ का निर्देश दिया गया था, जिसे चौबीसों घंटे स्थायी सुरक्षा देने का कोई ‘न्यायिक आदेश’ नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने सुरक्षा की मांग को लेकर दायर होने वाली याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर भी गहरी चिंता जताई।

एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा, “अदालत चिंता के साथ देख रही है कि लगभग हर अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह के मामले में जोड़े बिना किसी ठोस, पुख्ता और स्पष्ट सबूत के सुरक्षा की मांग को लेकर रिट याचिकाएं दायर कर रहे हैं।”

जस्टिस पिल्लई ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत सशस्त्र सुरक्षा जैसी असाधारण राहत पाने के लिए खतरे का बहुत पुख्ता प्रमाण होना आवश्यक है।

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उन्होंने कहा, “ऐसी असाधारण सुरक्षा की मांग करने वाली प्रत्येक याचिका में खतरे का स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए, न कि केवल संदिग्ध वाहनों के दिखने जैसी सामान्य आशंकाएं। ऐसी घटनाएं नियमित पुलिस गश्त और जांच का विषय हैं, न कि व्यक्तिगत सशस्त्र गार्ड तैनात करने का आधार।”

कोर्ट ने कहा- पुलिस अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती

याचिका खारिज करने के बावजूद, हाईकोर्ट ने स्थानीय पुलिस प्रशासन को उनके कानूनी कर्तव्यों की याद दिलाई।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह पुलिस प्रशासन का परम वैधानिक और संवैधानिक दायित्व है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे। जब भी ऐसी कोई शिकायत प्राप्त हो, अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे त्वरित और उचित कदम उठाएं।”

अदालत ने उम्मीद जताई कि रतलाम की स्थानीय पुलिस मामले की गंभीरता का आकलन करेगी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो ऐतिहासिक फैसलों में तय किए गए उपचारात्मक और निवारक दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन करेगी।

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