सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की अपील स्वीकार करते हुए सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और दिल्ली हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिनमें अधिकारियों को एक अभ्यर्थी के लिए फिजिकल एंड्योरेंस एंड मेजरमेंट टेस्ट (PE&MT) दोबारा आयोजित करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने टिप्पणी की कि सरकारी नौकरी एक सीमित संसाधन है और इसे पाने के लिए उम्मीदवारों को “उत्साह और पहल” (drive and initiative) दिखानी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
उत्तरदाता, उत्तम कुमार ने 1 सितंबर 2023 के विज्ञापन के तहत दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल (कार्यकारी) के पद के लिए आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया के पहले चरण में सफल होने के बाद, उन्हें 14 जनवरी 2024 को फिजिकल टेस्ट (PE&MT) के लिए उपस्थित होना था।
भर्ती विज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि फिजिकल टेस्ट का शेड्यूल अंतिम है और इसे किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता। इसके बावजूद, उत्तरदाता ने सर्दी, खांसी, बुखार और बदन दर्द जैसी बीमारियों का हवाला देते हुए टेस्ट में हिस्सा नहीं लिया। उन्होंने 13, 14 और 25 जनवरी 2024 को तीन आवेदन (representations) देकर टेस्ट की तारीख आगे बढ़ाने की मांग की थी। जब विभाग ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो उन्होंने ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।
ट्रिब्यूनल (CAT) ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि उत्तरदाता को अगले बैच के साथ फिजिकल टेस्ट देने की अनुमति दी जाए, जिसे बाद में 3 सितंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।
पक्षों के तर्क और साक्ष्य
निचली अदालतों के फैसले का मुख्य आधार यह था कि उत्तरदाता के आवेदनों पर विचार नहीं किया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों में कई विसंगतियां पाईं:
- पहला आवेदन संबंधित अधिकारी द्वारा स्वीकार ही नहीं किया गया था।
- दूसरे और तीसरे आवेदन के प्राप्त होने का कोई पुख्ता सबूत या पावती (acknowledgment) रिकॉर्ड पर नहीं थी।
- तीसरे आवेदन (25 जनवरी 2024) में उत्तरदाता ने स्वयं स्वीकार किया था कि वह 13 जनवरी को भर्ती कार्यालय तक गया था, लेकिन दावा किया कि 14 जनवरी को वह हिलने-डुलने में भी असमर्थ था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तरदाता के व्यवहार को “सुस्त और लापरवाह” बताते हुए कड़ी आलोचना की। पीठ ने कहा कि लगभग एक लाख उम्मीदवारों में से केवल उत्तरदाता ने ही शेड्यूल बदलने की मांग की थी।
शारीरिक उपस्थिति की अनिवार्यता पर: कोर्ट ने पाया कि उत्तरदाता की बीमारी इतनी गंभीर नहीं थी कि वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो।
“उनसे कम से कम इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती थी कि वे फिजिकल टेस्ट के लिए रिपोर्ट करते, अपनी असमर्थता बताते और फिर शेड्यूल बदलने का अनुरोध करते। इससे कम से कम अधिकारियों को यह तय करने का मौका मिलता कि क्या उत्तरदाता को वास्तव में राहत की जरूरत है या नहीं।”
विवेकाधिकार (Discretion) के प्रयोग पर: पीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट ने उत्तरदाता की पृष्ठभूमि या स्वास्थ्य के आधार पर रियायत देकर गलती की।
“यदि सार्वजनिक रोजगार में सभी को समान अवसर (level playing field) देना है, तो अनुकंपा, दान या करुणा को इससे दूर रखा जाना चाहिए।”
कोर्ट ने आगे कहा कि टेस्ट में शामिल न होना और फिर दूसरे मौके की उम्मीद करना अभ्यर्थी में पहल की कमी को दर्शाता है। पुलिस बल में शामिल होने के इच्छुक व्यक्ति का ऐसा आचरण उचित नहीं माना जा सकता।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विज्ञापन की शर्तों को देखते हुए, विभाग द्वारा उत्तरदाता के आवेदनों का जवाब न देना उसे दोबारा परीक्षा की तारीख मांगने का कोई “प्रवर्तनीय अधिकार” (enforceable right) नहीं देता है।
अदालत ने 7 जुलाई 2025 के ट्रिब्यूनल के आदेश और 3 सितंबर 2025 के हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया। अपील स्वीकार कर ली गई और आदेश दिया गया कि दोनों पक्ष अपना खर्च स्वयं वहन करेंगे।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: कमिश्नर, दिल्ली पुलिस और अन्य बनाम उत्तम कुमार
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 4150/2026
- पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
- दिनांक: 02 अप्रैल, 2026

