सरकारी वकीलों और लोक अभियोजकों की स्वतंत्र कार्यप्रणाली को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने एक विशेष लोक अभियोजक (SPP), पुलिस अधिकारियों और कुछ निजी व्यक्तियों के खिलाफ साजिश रचने के आरोपों वाली दो प्राथमिकियों (FIR) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है।
अदालत ने आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि एक सरकारी वकील (पब्लिक प्रोसिक्यूटर) राज्य सरकार का ‘पोस्ट बॉक्स’ नहीं होता है, जो केवल सरकार के इशारों पर काम करे।
मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति सुमन श्याम की पीठ ने अपने 20 मई के फैसले में इसे कानूनी प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग बताया। अदालत ने कहा कि ये प्राथमिकियां एक ‘आदतन मुकदमेबाज’ (habitual litigant) द्वारा अपने निजी हितों और आपसी रंजिश को भुनाने के लिए दर्ज कराई गई थीं।
मुख्य फैसला: सरकारी वकील और राज्य सरकार के निर्देश
यह पूरा मामला तब उच्च न्यायालय पहुंचा जब याचिकाकर्ताओं ने उनके खिलाफ मार्च और अगस्त 2024 में दर्ज की गई दो एफआईआर को रद्द करने की मांग की। मुंबई के एक व्यवसायी (शिकायतकर्ता) ने आरोप लगाया था कि विशेष लोक अभियोजक, पुलिस अधिकारियों और कुछ निजी लोगों ने मिलकर उन्हें झूठे मामलों में फंसाने की साजिश रची थी।
इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए हाईकोर्ट की पीठ ने न्याय व्यवस्था में लोक अभियोजक की भूमिका को रेखांकित किया।
न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“आपराधिक न्याय प्रशासन में सरकारी वकील की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वह राज्य का प्रतिनिधित्व करता है और राज्य द्वारा ही नियुक्त किया जाता है। लेकिन सरकारी वकील किसी पोस्ट बॉक्स की तरह काम नहीं करता और न ही वह राज्य सरकार के सीधे निर्देशों या डिक्टेट्स पर चलने के लिए बाध्य है।”
जजों ने यह भी साफ किया कि अदालतें किसी सरकारी वकील की राय मानने के लिए बाध्य नहीं हैं और वे यह तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं कि मामले में प्रथम दृष्टया (prima facie) कोई अपराध बनता है या नहीं। इसके साथ ही पीठ ने पुलिस को चेतावनी दी कि एफआईआर दर्ज करने और जांच करने की उनकी शक्ति असीमित या निरंकुश नहीं है। जब भी कोई शिकायत दुर्भावना (mala fide) से प्रेरित होती है, तो अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे हस्तक्षेप करें।
क्षेत्राधिकार की सीमा: पुलिस बनाम बार काउंसिल
इस फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह था कि कानूनी पेशेवरों (एडवोकेट्स) के आचरण की जांच करने का अधिकार आखिर किसके पास है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि विशेष लोक अभियोजक ने बिना किसी वैध अधिकार या नियुक्ति पत्र के अदालत में पैरवी की, जो कि एक गंभीर कदाचार है।
हाईकोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि पुलिस के पास किसी नामांकित अधिवक्ता के पेशेवर आचरण की जांच करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, “पुलिस द्वारा विशेष लोक अभियोजक (SPP) के कथित कदाचार की जांच करना कानूनन स्वीकार्य नहीं है।” अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की जांच सीधे तौर पर ‘बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा’ के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, जो वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने वाली एकमात्र अधिकृत संस्था है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने पहले इसी तरह के आरोपों के साथ बार काउंसिल का रुख किया था, जिसे काउंसिल ने प्रारंभिक जांच के बाद खारिज कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने बार काउंसिल के फैसले को दरकिनार कर पुलिस का सहारा लेकर अपना व्यक्तिगत एजेंडा आगे बढ़ाने की कोशिश की।
आपसी रंजिश और ‘आदतन मुकदमेबाजी’ का इतिहास
हाईकोर्ट ने जब इन शिकायतों की बारीकी से जांच की, तो शिकायतकर्ता और एक अन्य व्यवसायी के बीच लंबे समय से चली आ रही गहरी व्यक्तिगत दुश्मनी का खुलासा हुआ।
अदालत ने शिकायतकर्ता को एक ‘आदतन मुकदमेबाज’ करार दिया, जो पहले से ही न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act) के तहत कार्रवाई का सामना कर रहा है। विवादों के इतिहास की समीक्षा करने पर सालों पुराना एक उलझा हुआ घटनाक्रम सामने आया:
- शुरुआत: दोनों पक्षों के बीच शहरी भूमि सीमा (ULC) प्रमाणपत्रों और राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी को लेकर कई विवाद शुरू हुए।
- 2021 का विवाद: शिकायतकर्ता के खिलाफ जबरन वसूली, साजिश और पुलिस मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप में कई मामले दर्ज किए गए, जिसमें मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मुख्य मामला भी शामिल था।
- 2023 की शिकायतें: शिकायतकर्ता ने आरटीआई (RTI) के जरिए विशेष सरकारी वकील की नियुक्ति पर सवाल उठाए और बार काउंसिल में शिकायत दर्ज कराई, जिसे खारिज कर दिया गया।
- 2024 की एफआईआर: पिछले प्रयासों में विफल रहने के बाद, शिकायतकर्ता ने मार्च 2024 में जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप में पहली एफआईआर दर्ज कराई, और फिर अगस्त 2024 में एक बड़ी साजिश का आरोप लगाते हुए दूसरी एफआईआर दर्ज करा दी।
हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता अपने इन गंभीर आरोपों या आपराधिक साजिश के दावों के समर्थन में कोई भी ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
अदालत में दोनों पक्षों की कानूनी दलीलें
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं:
- विशेष सरकारी वकील (SPP) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शकधर ने दलील दी कि एफआईआर को सरसरी तौर पर पढ़ने से भी किसी वास्तविक अपराध का पता नहीं चलता। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल की नियुक्ति आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। ये शिकायतें केवल शिकायतकर्ता की उस खुंदक का नतीजा हैं क्योंकि एसपीपी ने अदालत में उसकी जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं का पुरजोर विरोध किया था।
- शिकायतकर्ता की ओर से: दूसरी तरफ, अधिवक्ता रिजवान मर्चेंट ने दावा किया कि विशेष सरकारी वकील ने फर्जी नियुक्ति पत्र के आधार पर कई अदालती कार्यवाहियों में हिस्सा लिया, जिसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी रिकॉर्ड में हेराफेरी करने और उनके मुवक्किल को झूठे मामलों में फंसाने के लिए आरोपियों के बीच साठगांठ थी।
दुर्भावनापूर्ण मुकदमों पर हाईकोर्ट की बड़ी चेतावनी
अपने अंतिम निष्कर्ष में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक प्रसिद्ध कानूनी सिद्धांत “omnia praesumuntur rite esse acta” (अर्थात, सभी आधिकारिक और न्यायिक कार्यों को तब तक सही और नियमित रूप से किया गया माना जाता है, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए) का हवाला दिया।
पीठ ने किसी भी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के गंभीर सामाजिक और व्यक्तिगत प्रभावों पर भी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में एफआईआर एक बेहद संवेदनशील दस्तावेज होता है और किसी अपराध की तुरंत रिपोर्ट करना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
इस मामले में, एफआईआर दर्ज कराने में की गई लंबी देरी ने शिकायत को संदिग्ध बना दिया, जिससे यह साफ होता है कि यह शिकायतें केवल बदले की भावना और बाद में सोच-समझकर रची गई कहानी का हिस्सा थीं। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ऐसे दुर्भावनापूर्ण मुकदमों को जारी रखने की अनुमति देना पूरी कानूनी प्रणाली का मखौल उड़ाने जैसा होगा, इसलिए दोनों एफआईआर को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाता है।

