दिल्ली हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका को अत्यधिक देरी के आधार पर खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक अभ्यास करने वाला अधिवक्ता (practising advocate) “कानूनी शोध” (legal research) करने या अदालती आदेश को समझने में कठिनाई होने का हवाला देकर एक साल से अधिक की देरी को “पर्याप्त कारण” (sufficient cause) के रूप में उचित नहीं ठहरा सकता।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सुनवाई के दौरान कहा कि हालांकि धारा 482 के तहत याचिका दायर करने के लिए कानून में कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं है, फिर भी ऐसी याचिकाएं एक उचित समय के भीतर दायर की जानी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि सामान्यतः इसके लिए 90 दिनों की अवधि (जो पुनरीक्षण याचिकाओं के लिए लागू होती है) को एक उचित समय माना जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, अजीत कुमार गोला, ने रोहिणी कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज द्वारा 19 जनवरी 2023 को पारित एक आदेश को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सत्र न्यायालय (Sessions Court) ने अपने आदेश में मामले के मुख्य आरोपी को बरी कर दिया था और उसके खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया था।
हाईकोर्ट में दायर मुख्य याचिका (CRL.M.C. 1913/2024) के साथ याचिकाकर्ता ने देरी माफी के लिए एक आवेदन (CRL.M.A. 17529/2024) भी लगाया था, क्योंकि याचिका दायर करने में 412 दिनों की देरी हुई थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता ने स्वयं बहस करते हुए तर्क दिया कि यह देरी जानबूझकर नहीं की गई थी। उनका कहना था कि धारा 482 के तहत कोई वैधानिक समय सीमा नहीं है, इसलिए तकनीकी तौर पर इसे देरी नहीं माना जाना चाहिए। देरी का कारण बताते हुए गोला ने कहा कि एक वकील होने के नाते उन्हें सत्र न्यायालय के आदेश के निहितार्थों को समझने और “विस्तृत कानूनी शोध” करने में काफी समय लग गया, जिसके कारण हाईकोर्ट आने में समय लगा।
दूसरी ओर, राज्य के वकील और प्रतिवादियों के वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता का आचरण लापरवाही और तत्परता की कमी को दर्शाता है। उन्होंने तर्क दिया कि एक वकील का यह कहना कि वह आदेश नहीं समझ सका, पूरी तरह से निराधार है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने मूल चंद्र बनाम भारत संघ (2024) और ओडिशा राज्य बनाम नामतारा गर्ल्स हाई स्कूल की प्रबंध समिति (2026) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि देरी माफ करना अदालत का विवेकाधिकार है और इसके लिए “ठोस कारण” होना अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता के वकील होने की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा:
“एक स्वयं प्रतिनिधित्व करने वाले वादी द्वारा न्यायिक आदेश को समझने में सक्षम न होना, या किसी वकील द्वारा मुवक्किल की ओर से ब्रीफ प्राप्त करने के बाद यह कहना कि वह आदेश नहीं समझ सका, उपाय प्राप्त करने में हुई अत्यधिक देरी को उचित ठहराने का आधार नहीं हो सकता।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि यदि इस तरह के तर्कों को स्वीकार कर लिया गया, तो “पर्याप्त कारण” दिखाने की आवश्यकता ही खत्म हो जाएगी। बेंच ने टिप्पणी की:
“रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि याचिकाकर्ता ने उचित तत्परता दिखाई… हर वादी या वकील यह आधार ले लेगा कि वह न्यायिक आदेश को समझने में असमर्थ था और एक साल से अधिक समय तक कानूनी शोध करने में व्यस्त रहा।”
समय सीमा पर स्थिति स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने लोन्धे प्रकाश भगवान बनाम दत्तात्रेय एकनाथ माने (2013) और दिल्ली हाईकोर्ट के ही अन्य फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने दोहराया कि धारा 482 के तहत शक्तियों का उपयोग करने के लिए 90 दिनों की अवधि को ही पर्याप्त और उचित माना जाना चाहिए।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता एक साल से अधिक की देरी के लिए कोई “पर्याप्त कारण” बताने में विफल रहे हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “दिया गया स्पष्टीकरण याचिका दायर करने में हुई लंबी देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताता है।” इसके साथ ही, देरी माफी के आवेदन को खारिज कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप मुख्य याचिका भी देरी और ‘लाचेस’ (laches) के आधार पर खारिज हो गई।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: अजीत कुमार गोला बनाम राज्य (NCT दिल्ली) एवं अन्य
- केस नंबर: CRL.M.C. 1913/2024 और CRL.M.A. 17529/2024
- बेंच: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा
- दिनांक: 04 अप्रैल, 2026

