पिता की मृत्यु के बाद तलाक लेने वाली बेटी फैमिली पेंशन की हकदार नहीं: त्रिपुरा हाईकोर्ट

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि कोई बेटी अपने पेंशनभोगी माता-पिता की मृत्यु के बाद तलाक की डिक्री प्राप्त करती है, तो वह त्रिपुरा राज्य सिविल सेवा (संशोधित पेंशन) नियम, 2017 के तहत फैमिली पेंशन की हकदार नहीं होगी। जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ ने स्पष्ट किया कि ऐसी पेंशन प्राप्त करने का अधिकार पेंशनभोगी या उनके जीवनसाथी की मृत्यु के समय ही उत्पन्न होता है, और उस तिथि पर दावेदार को “तलाकशुदा बेटी” की पात्रता मानदंडों को पूरा करना अनिवार्य है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता उज्ज्वला रानी पॉल, अगरतला नगर निगम (AMC) के पूर्व मजदूर स्वर्गीय रासबिहारी पॉल की बेटी हैं। रासबिहारी पॉल 2004 में सेवानिवृत्त हुए थे और 2 दिसंबर, 2018 को उनका निधन हो गया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि शादी के कुछ समय बाद ही उनका पति लापता हो गया था और वह पिछले 40 वर्षों से अपने पिता के साथ रह रही थीं। हालांकि, कानूनी रूप से उनके विवाह विच्छेद की डिक्री (तलाक) 4 अक्टूबर, 2021 को प्राप्त हुई—जो उनके पिता की मृत्यु के लगभग तीन साल बाद थी।

तलाक के बाद, याचिकाकर्ता ने 23 फरवरी, 2022 को फैमिली पेंशन के लिए आवेदन किया। अगरतला नगर निगम ने 4 अक्टूबर, 2024 को उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पिता की मृत्यु के समय वह तलाकशुदा नहीं थीं। इसी निर्णय को याचिकाकर्ता ने रिट याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट पी. रॉय बर्मन ने दलील दी कि भले ही औपचारिक डिक्री 2021 में आई हो, लेकिन याचिकाकर्ता दशकों से वास्तव में अपने पिता पर आश्रित थी। उन्होंने तर्क दिया कि संशोधित पेंशन नियम, 2017 में यह कहीं नहीं लिखा है कि तलाक पेंशनभोगी के जीवनकाल में ही होना चाहिए। उन्होंने ऑल मणिपुर पेंशनर्स एसोसिएशन बनाम मणिपुर राज्य (2019) मामले का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन से इनकार करना एक ही श्रेणी के लोगों के बीच भेदभाव पैदा करना होगा।

प्रतिवादी (AMC) के तर्क: नगर निगम की ओर से एडवोकेट अरिजीत भौमिक ने तर्क दिया कि फैमिली पेंशन की पात्रता पेंशनभोगी की मृत्यु की तिथि पर निर्धारित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस दिन रासबिहारी पॉल का निधन हुआ, याचिकाकर्ता की स्थिति एक “विवाहित बेटी” की थी न कि “तलाकशुदा” की। उन्होंने 2013 और 2017 के केंद्र सरकार के कार्यालय ज्ञापनों (OM) का हवाला दिया, जो स्पष्ट करते हैं कि फैमिली पेंशन केवल उन बेटियों को दी जा सकती है जिनका तलाक का मामला कम से कम माता-पिता के जीवनकाल में शुरू हो चुका हो। उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मिता साहा कर्मकार (2025) के फैसले का भी उल्लेख किया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

कोर्ट ने संशोधित पेंशन नियम, 2017 के नियम 8 पर ध्यान केंद्रित किया, जो “अविवाहित/विधवा बेटी/तलाकशुदा/दिव्यांग बच्चे” को फैमिली पेंशन का प्रावधान देता है।

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में कहा:

“फैमिली पेंशन की पात्रता के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि जब मूल पेंशनभोगी की मृत्यु हो, तब बेटी तलाकशुदा होनी चाहिए, क्योंकि ऐसी पेंशन प्राप्त करने का अधिकार मूल पेंशनभोगी या पेंशन प्राप्त कर रहे उनके जीवनसाथी की मृत्यु पर ही उत्पन्न होता है।”

जस्टिस पुरकायस्थ ने उल्लेख किया कि हालांकि भारत सरकार ने उन मामलों में लाभ का विस्तार किया है जहाँ तलाक की कार्यवाही माता-पिता की मृत्यु से पहले शुरू हुई थी, लेकिन याचिकाकर्ता का मामला इस मानक पर भी खरा नहीं उतरता क्योंकि उन्होंने तलाक के लिए आवेदन ही 2021 में किया था।

पिता की मृत्यु के समय उनकी स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“…उस समय, उनकी स्थिति ‘अपने पति से अलग रहने वाली विवाहित बेटी’ की थी, न कि तलाकशुदा बेटी की। नियम विवाहित बेटियों की उक्त श्रेणी को फैमिली पेंशन देने की अनुमति नहीं देते हैं।”

कोर्ट ने नीतिगत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर भी बात की और सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम देवकी नंदन अग्रवाल (1992) मामले का उदाहरण दिया:

“यह कोर्ट का कर्तव्य नहीं है कि वह कानून के दायरे या विधायिका के इरादे को बढ़ाए, जबकि प्रावधान की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध हो। कोर्ट कानून को दोबारा नहीं लिख सकता या उसे नया रूप नहीं दे सकता, क्योंकि उसके पास कानून बनाने की शक्ति नहीं है।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता को भेदभाव का शिकार नहीं माना जा सकता, क्योंकि कानून केवल विवाहित बेटियों की कुछ विशिष्ट श्रेणियों (विधवा या तलाकशुदा) को ही लाभ के लिए नामित करता है। याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: श्रीमती उज्ज्वला रानी पॉल बनाम अगरतला नगर निगम व अन्य
  • केस नंबर: WP(C) 132 OF 2025
  • बेंच: जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ
  • तिथि: 1 अप्रैल, 2026

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