इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में उस व्यक्ति को जमानत पर तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया है, जिसे फैमिली कोर्ट ने भरण-पोषण (maintenance) की राशि न देने के कारण 22 महीने के कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने स्पष्ट किया कि चूंकि पुनरीक्षणकर्ता (revisionist) सिविल जेल में है, इसलिए उसे जमानत बॉन्ड या प्रतिभूति (surety) प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला ताहिर उर्फ बब्लू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य (क्रिमिनल रिवीज़न संख्या 1508/2026) से संबंधित है। झांसी स्थित फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने 16 दिसंबर, 2025 को एक आदेश पारित किया था। यह आदेश दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 128 [BNSS की धारा 147] के तहत 22 महीनों (1 नवंबर 2023 से 1 सितंबर 2025 तक) के कुल ₹2,64,000 के भरण-पोषण बकाये की वसूली के लिए दिया गया था।
रिकवरी और गिरफ्तारी वारंट के बाद ताहिर को 3 दिसंबर 2025 को कोर्ट में पेश किया गया। जब उसने राशि जमा करने से इनकार कर दिया, तो फैमिली कोर्ट ने उसे दोषी मानते हुए प्रत्येक महीने के डिफॉल्ट के लिए एक महीना, यानी कुल 22 महीने की जेल की सजा सुना दी।
पक्षों की दलीलें
पुनरीक्षणकर्ता के वकील संतोष कुमार सिंह ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट का आदेश Cr.P.C. की धारा 125(3) के प्रावधानों के विपरीत है। उन्होंने दलील दी कि कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति भुगतान करने में विफल रहता है, तो अदालत उसे केवल एक महीने के लिए या भुगतान होने तक (जो भी पहले हो) सिविल जेल भेज सकती है। वकील ने तर्क दिया कि एक साथ 22 महीने की सजा देना कानून सम्मत नहीं है और अदालत को जेल भेजने के बजाय संपत्ति की कुर्की जैसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी।
राज्य की ओर से स्टेट लॉ ऑफिसर श्री मयंक अवस्थी ने पक्ष रखा।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने Cr.P.C. की धारा 125(3) का अवलोकन किया, जिसमें कहा गया है:
“यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त कारण के बिना आदेश का पालन करने में विफल रहता है, तो कोई भी मजिस्ट्रेट… वारंट के निष्पादन के बाद भी भुगतान न की गई राशि के लिए ऐसे व्यक्ति को कारावास की सजा दे सकता है, जो एक महीने तक बढ़ सकती है या भुगतान किए जाने तक (जो भी पहले हो) हो सकती है।”
फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में राजस्थान हाईकोर्ट के D.B. क्रिमिनल रेफरेंस संख्या 02/2020 और सुप्रीम कोर्ट के गोरक्षनाथ खांडू बागल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005) व शान्था बनाम बी.जी. शिवनन्जप्पा (2005) जैसे फैसलों का हवाला दिया था, ताकि 22 महीने की सजा को उचित ठहराया जा सके। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों और हिरासत की प्रकृति को देखते हुए, हाईकोर्ट ने पाया कि पुनरीक्षणकर्ता राहत का हकदार है।
अदालत का निर्णय
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने ताहिर उर्फ बब्लू को जमानत प्रदान की। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से कहा:
“मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए, पुनरीक्षणकर्ता ताहिर उर्फ बब्लू… को जमानत दी जाती है और चूंकि वह सिविल जेल में है, इसलिए जमानत बॉन्ड और प्रतिभूति प्रस्तुत करने की कोई आवश्यकता नहीं है और उसे तत्काल रिहा किया जाएगा।”
अदालत ने रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) और झांसी के फैमिली कोर्ट को निर्देशित किया कि वे तत्काल जेल अधीक्षक को रिहाई की सूचना भेजें। साथ ही, जेल से तुरंत रिहाई के लिए प्रमाणित प्रति (certified copy) की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया गया। मामले की अगली सुनवाई 18 मई, 2026 को तय की गई है।
केस विवरण:
- केस टाइटल: ताहिर उर्फ बब्लू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल रिवीज़न संख्या 1508 ऑफ 2026
- बेंच: न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी
- आदेश की तिथि: 2 अप्रैल, 2026

