सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) में अध्यक्ष और सदस्यों की नियमित एवं स्थाई नियुक्तियों की मांग करने वाली याचिका पर दिल्ली सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की। इसके साथ ही पीठ ने दिल्ली सरकार के वकील को निर्देश दिया है कि वे मामले की अगली सुनवाई तक इस विषय पर सरकार से आवश्यक दिशा-निर्देश लेकर पूरी तैयारी के साथ अदालत में उपस्थित रहें। इस मामले की अगली सुनवाई अगले हफ्ते तय की गई है।
यह याचिका गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘एनर्जी वॉचडॉग’ की ओर से दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली के बिजली नियामक आयोग में प्रशासनिक शून्यता की स्थिति बनी हुई है, जिससे उपभोक्ताओं की शिकायतों के निपटारे का काम पूरी तरह से ठप हो गया है।
याचिका में शीर्ष अदालत के पिछले साल अगस्त के एक आदेश का हवाला दिया गया है। उस समय एक अन्य याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के वकील के उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि डीईआरसी में नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया को जल्द से जल्द (expeditiously) पूरा कर लिया जाएगा।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इस सरकारी आश्वासन के बावजूद और विद्युत अधिनियम, 2003 के स्पष्ट वैधानिक नियमों की अनदेखी कर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के ही अप्रैल 2018 के एक फैसले का भी उल्लंघन हो रहा है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य बिजली नियामक आयोगों में एक न्यायिक सदस्य (या कानून के जानकार व्यक्ति) का होना अनिवार्य है।
यह विवाद तब और गहरा गया जब जुलाई 2025 में डीईआरसी के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) उमेश कुमार सेवामुक्त (superannuated) हो गए। उनके जाने के बाद से आयोग में कोई नियमित मुखिया नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रणव सचदेवा ने अदालत में दलील दी कि वर्तमान में डीईआरसी का ढांचा पूरी तरह से गैर-कानूनी है। आयोग में न तो कोई स्थाई अध्यक्ष है और न ही कोई कानूनी या न्यायिक सदस्य। फिलहाल यह पूरा आयोग केवल दो ‘प्रो-टेम’ (अस्थायी) सदस्यों के सहारे चल रहा है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि न्यायिक सदस्य के न होने से डीईआरसी की न्यायनिर्णयन (adjudicatory) क्षमता पूरी तरह प्रभावित हुई है। इसके साक्ष्य के रूप में याचिका में आयोग की वेबसाइट पर 15 जुलाई 2025 को जारी एक प्रशासनिक नोटिस का संदर्भ दिया गया है। इस नोटिस के अनुसार, विद्युत अधिनियम की धारा 142 के तहत आने वाले उपभोक्ताओं के आवेदनों और शिकायतों को अब सूचीबद्ध (list) नहीं किया जा रहा है और न ही उनकी सुनवाई हो रही है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई रुकने से उपभोक्ताओं के मौलिक अधिकारों (संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत) का खुला उल्लंघन हो रहा है, जो उन्हें न्याय पाने का अधिकार देते हैं।
अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि लंबे समय तक ‘प्रो-टेम’ व्यवस्था के जरिए आयोग का संचालन करना देश के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है। विद्युत अधिनियम के तहत यह आवश्यक है कि राज्य विद्युत नियामक आयोग पूरी तरह स्वतंत्र और सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रहें।
याचिका में कहा गया:
“चूंकि प्रो-टेम सदस्य केवल इस अदालत द्वारा न्याय के हित में तैयार की गई एक अस्थायी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं… इसलिए याचिकाकर्ता को उनकी नियुक्तियों को रद्द करने और कानून के अनुसार नियमित नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश देने के लिए इस अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।”
याचिका के अनुसार, नियमित और निश्चित कार्यकाल वाली नियुक्तियां ही आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित कर सकती हैं। तदर्थ या अस्थायी तंत्र को लंबे समय तक जारी रखना “शक्तियों के पृथक्करण” (Separation of Powers) और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बुनियादी सिद्धांतों को कमजोर करता है।
‘एनर्जी वॉचडॉग’ ने सुप्रीम कोर्ट से निम्नलिखित प्रमुख राहतें मांगी हैं:
- दिल्ली सरकार को यह निर्देश दिया जाए कि वह एक हलफनामा दायर कर बताए कि उसने पिछले साल अगस्त में अदालत को दिए अपने आश्वासन को पूरा करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए हैं।
- दिल्ली सरकार को तत्काल एक चयन समिति (Selection Committee) गठित करने का आदेश दिया जाए, जो डीईआरसी के अध्यक्ष और सदस्यों की नियमित एवं स्थाई नियुक्ति की प्रक्रिया को पूरा कर सके।
अदालत अब अगले सप्ताह इस मामले पर आगे विचार करेगी।

