सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें यू.पी. को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करता है, तो बिना मौखिक जांच (Oral Enquiry) और गवाहों के परीक्षण के उसे बर्खास्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि जब तक आरोपी कर्मचारी स्पष्ट रूप से अपना दोष स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक नियोक्ता की यह जिम्मेदारी है कि वह पहले साक्ष्य प्रस्तुत करे और कर्मचारी को गवाहों से जिरह (Cross-examination) करने का अवसर दे।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता जय प्रकाश सैनी यू.पी. को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड में धान खरीद केंद्र के प्रभारी के रूप में कार्यरत थे। उन पर 1093.60 क्विंटल धान की कम आपूर्ति और ₹2,00,850 के गबन का आरोप लगाते हुए चार्जशीट जारी की गई थी। विभागीय जांच के बाद उन्हें 30 नवंबर 2015 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और ₹9,53,433 की वसूली का आदेश दिया गया।
सैनी ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि जांच के दौरान न तो कोई गवाह पेश किया गया और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिला। हालांकि, 12 अप्रैल 2019 को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि जांच अधिकारी ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था और याचिकाकर्ता ने गवाहों को बुलाने की कोई विशेष मांग नहीं की थी।
पक्षकारों के तर्क
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता ने दलील दी कि चूंकि उन्होंने आरोपों को सिरे से खारिज किया था, इसलिए उन्हें साबित करने का भार फेडरेशन पर था। बिना किसी गवाह के परीक्षण के की गई जांच कानूनी रूप से शून्य है।
दूसरी ओर, फेडरेशन का तर्क था कि अपीलकर्ता का जवाब ‘गोलमोल’ (Evasive) था, जिसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 58 के तहत अपराध की स्वीकारोक्ति माना जाना चाहिए। फेडरेशन के अनुसार, उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर जांच रिपोर्ट पूरी तरह तर्कसंगत थी।
कोर्ट का विश्लेषण
पीठ ने फेडरेशन के ‘गोलमोल जवाब’ वाले तर्क को खारिज करते हुए जस्टिस मनोज मिश्रा के माध्यम से कहा:
“विभागीय चार्जशीट कोई ‘प्लेंट’ (Plaint) नहीं है जहां गोलमोल जवाब को स्वीकारोक्ति मान लिया जाए। विभागीय जांच में, जब तक आरोप स्वीकार न कर लिए जाएं, उन्हें साबित करने की जिम्मेदारी विभाग की होती है।”
कोर्ट ने सर्विस रूल्स, 1980 के नियम 84 और 1975 के रेगुलेशन 85 का हवाला दिया, जो गवाहों से जिरह करने के अधिकार की रक्षा करते हैं। चमोली जिला सहकारी बैंक बनाम रघुनाथ सिंह राणा (2016) मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने जोर दिया कि आरोपों के खंडन की स्थिति में मौखिक जांच अनिवार्य है।
पीठ ने सुर इनेमल एंड स्टैम्पिंग वर्क्स लिमिटेड बनाम वर्कमैन (1963) और उत्तरांचल राज्य बनाम खड़क सिंह (2008) के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा:
“दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित मामलों में भी, जब तक कर्मचारी उन दस्तावेजों को स्वीकार न करे, उन्हें साबित करने के लिए गवाह पेश करना जरूरी है और उस गवाह को जिरह के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विभाग द्वारा कोई गवाह पेश न किए जाने के कारण पूरी जांच प्रक्रिया दूषित हो गई थी। इसलिए बर्खास्तगी और वसूली का आदेश टिकने योग्य नहीं है।
कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया। हालांकि, फेडरेशन को छह महीने के भीतर नए सिरे से (de novo) जांच करने की छूट दी गई है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- यदि फेडरेशन नई जांच शुरू करता है, तो अपीलकर्ता को बहाल कर निलंबित रखा जाए और उन्हें कानून के अनुसार निलंबन भत्ता दिया जाए।
- यदि तय समय में जांच शुरू नहीं होती है, तो अपीलकर्ता को सेवा में निरंतरता और बकाया वेतन के साथ पूर्ण बहाली का लाभ मिलेगा।
केस विवरण:
- केस टाइटल: जय प्रकाश सैनी बनाम मैनेजिंग डायरेक्टर, यू.पी. को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड व अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (SLP (C) No. 2900/2020 से उद्भूत)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनोज मिश्रा
- दिनांक: 01 अप्रैल, 2026

