दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए उन सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने का निर्देश दिया है, जिनमें एक कॉर्पोरेट पेशेवर पर उड़ान के दौरान एक महिला पत्रकार के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया गया था। जस्टिस विकास महाजन ने टिप्पणी की कि किसी औपचारिक जांच से पहले व्यक्ति की पहचान उजागर करना और उसे “अपराधी” या “छेड़छाड़ करने वाला” करार देना, गरिमा के साथ जीने और निष्पक्ष सुनवाई के उसके मौलिक अधिकार का “गंभीर उल्लंघन” है।
यह विवाद 11 मार्च को दिल्ली से मुंबई जाने वाली इंडिगो की एक फ्लाइट में हुई घटना से शुरू हुआ। 20 से अधिक वर्षों का बेदाग करियर रखने वाले वादी (कॉर्पोरेट पेशेवर) ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी—एक महिला पत्रकार—ने अचानक उसे नींद से जगाया और उस पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया।
मुकदमे के अनुसार, महिला ने उसी दिन सुबह 09:39 बजे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट प्रकाशित की, जिसमें व्यक्ति की पहचान और उसकी तस्वीर साझा की गई। हालांकि, इस मामले में औपचारिक प्राथमिकी (FIR) दोपहर 12:27 बजे दर्ज की गई थी। वादी का तर्क है कि इस “अत्यधिक जल्दबाजी में किए गए सार्वजनिक खुलासे” ने “मीडिया ट्रायल” को जन्म दिया, जिसके कारण उन्हें उनके कार्यस्थल से निलंबित कर दिया गया और उनकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति हुई।
वादी के वकील ने तर्क दिया कि ये आरोप प्रतिवादी पत्रकार द्वारा सार्वजनिक परिवहन में उत्पीड़न पर बनाए गए एक पुराने डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट की कहानी से काफी मिलते-जुलते हैं। यह भी दलील दी गई कि मीडिया घरानों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने केवल FIR की रिपोर्टिंग नहीं की, बल्कि वादी को “दोषी” और “छेड़छाड़ करने वाला” बताकर मामले का समय से पहले ही फैसला सुना दिया।
इसके जवाब में, महिला पत्रकार के वकील ने किसी भी प्रकार के “गैग ऑर्डर” का विरोध किया और कहा कि मानहानि के मामलों में “सत्य” ही पूर्ण बचाव है।
जस्टिस विकास महाजन ने अपने अंतरिम आदेश में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आरोपों के “सनसनीखेज” स्वरूप पर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने नोट किया कि शुरुआती सोशल मीडिया पोस्ट आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही डाल दी गई थी और सोशल मीडिया पोस्ट व FIR में वादी की पहचान को लेकर भी “भिन्नता” थी।
कोर्ट ने इस विवाद में सार्वजनिक हस्तियों (Public Figures) की भूमिका पर भी विशेष टिप्पणी की, विशेष रूप से अभिनेता ऋचा चड्ढा के एक ट्वीट का जिक्र किया जिसने इन आरोपों को और बढ़ावा दिया। कोर्ट ने कहा:
“प्रतिवादी नंबर 7 [ऋचा चड्ढा] का आचरण केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने ‘सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और डिजिटल विजिलेंटिज्म (डिजिटल रूप से खुद ही न्याय करना)’ के लिए उत्प्रेरक का काम किया।”
जजों ने आगे कहा कि एक सार्वजनिक हस्ती होने के नाते, चड्ढा की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह गंभीर आरोपों को बढ़ावा देने के लिए अपने प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से पहले तथ्यों की सत्यता की जांच करें। हालांकि चड्ढा के वकील ने बताया कि ट्वीट पहले ही हटाया जा चुका है, लेकिन हाईकोर्ट ने उन्हें भविष्य में ऐसी स्थिति पैदा न करने की चेतावनी दी।
न्यायिक प्रक्रिया पर इसके व्यापक प्रभाव के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:
“यद्यपि प्रतिवादी नंबर 1 के पास अपनी शिकायत दर्ज कराने का निर्बाध अधिकार है, लेकिन औपचारिक जांच शुरू होने से पहले ही अनुचित स्पर्श के आरोपों को प्रसारित करने और वादी की तस्वीर के साथ उसकी पहचान उजागर करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करना, इस कोर्ट की प्रथम दृष्टया राय में, वादी के गरिमा के साथ जीने और निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।”
दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला पत्रकार के साथ-साथ ‘OBNews’ और ‘Pardafaash Media’ जैसे प्लेटफॉर्मों को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई तक वादी के खिलाफ कोई भी मानहानिकारक आरोप प्रकाशित न करें।
इसके अलावा, कोर्ट ने X, गूगल एलएलसी (Google LLC) और मेटा प्लेटफॉर्म्स एलएलसी (Meta Platforms LLC) को मौजूदा मानहानिकारक पोस्ट को “तत्काल हटाने” का आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि प्रतिवादी जनहित में FIR की सामग्री साझा कर सकते हैं, लेकिन उन्हें ऐसी सामग्री प्रसारित करने से बचना चाहिए जो वादी के चरित्र पर सवाल उठाए या जांच के दौरान उसके प्रति पूर्वाग्रह का माहौल पैदा करे।

