कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक किरायेदार द्वारा दायर इंट्रा-कोर्ट अपील को खारिज करते हुए उसकी बेदखली (eviction) के आदेश को बरकरार रखा है। जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि जब तक दोनों पक्षों के बीच किसी नए समझौते के पुख्ता सबूत न हों, तब तक केवल मासिक किराया रसीदें जारी होने से पुराने लीज डीड की जगह कोई नया स्वतंत्र टेनेंसी एग्रीमेंट नहीं ले लेता।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत 1 अप्रैल, 2004 को नंद लाल राठी (अपीलकर्ता/कि किरायेदार) और मेसर्स ए. टी. गुई एंटरप्राइजेज (प्रतिवादी/मकान मालिक) के बीच हुए एक ‘लीव एंड लाइसेंस’ एग्रीमेंट से हुई थी। मकान मालिक का तर्क था कि यह केवल एक लाइसेंस था, जबकि किरायेदार ने सिंगल जज के सामने इसे लीज डीड साबित कर दिया। हालांकि, सिंगल जज ने किरायेदार के पक्ष को स्वीकार करने के बावजूद मकान मालिक के बेदखली के दावे को सही माना और डिक्री पारित कर दी। इसी फैसले को किरायेदार ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी। किरायेदार का मुख्य तर्क यह था कि 2004 का मूल समझौता अब प्रभावी नहीं है और उसकी जगह एक नई ‘स्वतंत्र मासिक किरायेदारी’ शुरू हो चुकी है।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (किरायेदार) ने मुख्य रूप से तीन बातें कहीं:
- मकान मालिक की पहचान: किरायेदार का दावा था कि मूल लीज “M/s A.T. Goyee Enterprises” के साथ हुई थी, जबकि किराया रसीदें “M/s. A. T. Gooyee Enterprises” के नाम से दी गईं। उसने तर्क दिया कि ये दोनों अलग-अलग संस्थाएं हैं।
- अनुबंध का नवीनीकरण (Novation): उसने तर्क दिया कि चूंकि किराया (46,000 रुपये प्रति माह) मूल डीड की शर्तों से अलग था, इसलिए पुरानी डीड खत्म मानी जानी चाहिए और मासिक रसीदें एक नई किरायेदारी का प्रमाण हैं।
- पंजीकरण का अभाव: डीड रजिस्टर्ड न होने के कारण किरायेदार ने इसे ‘ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882’ के तहत केवल एक मासिक किरायेदारी बताया।
प्रतिवादी (मकान मालिक) ने दलील दी कि नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर का कोई महत्व नहीं है और दोनों पक्षों ने इन्हें हमेशा एक ही माना। साथ ही, उन्होंने कहा कि कानून की धारा 106 के तहत नोटिस देकर किरायेदारी को वैध रूप से समाप्त किया जा चुका है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि किरायेदार ने स्वयं ट्रायल कोर्ट में यह स्वीकार किया था कि उसने 1 अप्रैल, 2004 को कब्जा लिया और 2,70,000 रुपये की सुरक्षा राशि जमा की—जो ठीक उसी मूल डीड की शर्तें थीं जिसे वह अब नकार रहा है।
बेंच ने टिप्पणी की:
“यह एक स्वीकृत स्थिति है कि दोनों पक्षों के बीच लीज का कानूनी संबंध 1 अप्रैल, 2004 की डीड के अनुसार शुरू हुआ था। अपीलकर्ता के पास अब इस स्थिति से पीछे हटने और यह दावा करने की कोई गुंजाइश नहीं है कि कोई स्वतंत्र किरायेदारी बनाई गई थी।”
अनुबंध के नवीनीकरण (Novation) के मुद्दे पर कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ किराया बदलने या मासिक बिल जारी होने से पुराना कानूनी ढांचा खत्म नहीं होता। बेंच ने कहा:
“अपीलकर्ता के तर्क के विपरीत, लीज डीड के माध्यम से अस्तित्व में आई किरायेदारी केवल मासिक किराया बिल जारी करने से स्वतः ही समाप्त या नई किरायेदारी में तब्दील नहीं हो जाती।”
कोर्ट ने आगे कहा कि किसी भी अनुबंध के नवीनीकरण के लिए दोनों पक्षों के बीच ‘सहमति’ (consensus ad idem) का होना अनिवार्य है, जिसका इस मामले में कोई प्रमाण नहीं मिला। नाम की स्पेलिंग में अंतर को भी कोर्ट ने “महत्वहीन” करार दिया।
अदालत का फैसला
डिवीजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि भले ही डीड रजिस्टर्ड न होने के कारण इसे मासिक किरायेदारी माना जाए, लेकिन मकान मालिक ने इसे कानूनन खत्म कर दिया था। 25 फरवरी, 2009 को जारी नोटिस में किरायेदार को 31 मार्च, 2009 तक खाली करने का समय दिया गया था, जिसे कोर्ट ने ‘ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 106’ के अनुरूप पाया।
कोर्ट ने अंत में कहा:
“इस प्रकार, भले ही लीज डीड के पंजीकरण के अभाव में पक्षों के बीच मासिक किरायेदारी रही हो, लेकिन प्रतिवादी द्वारा इसे 1882 के अधिनियम की धारा 106 के तहत वैध रूप से समाप्त कर दिया गया था।”
इसी के साथ, अपील (APDT/4/2026) को खारिज कर दिया गया और 25 अगस्त, 2025 के बेदखली के आदेश को बरकरार रखा गया।
केस विवरण:
- केस का नाम: नंद लाल राठी बनाम मेसर्स ए. टी. गुई एंटरप्राइजेज
- केस संख्या: APDT/4/2026 (IA No. GA/1/2026)
- बेंच: जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य
- दिनांक: 25 मार्च, 2026

