उत्तर प्रदेश में संकट में 5,000 से अधिक ऐतिहासिक धरोहरें: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से मांगा जवाब

उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में स्थित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों की जर्जर हालत पर गंभीर रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने राज्य भर में विरासत स्थलों के संरक्षण में बरती जा रही कथित लापरवाही पर विस्तृत जवाब तलब किया है।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, पर्यटन मंत्रालय, आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण और राज्य पुरातत्व विभाग को नोटिस जारी किए हैं। हाईकोर्ट ने संबंधित विभागों को आठ सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट का यह आदेश वकील आकाश वशिष्ठ द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर आया है। याचिका में उत्तर प्रदेश की अनमोल विरासतों की संख्या और उन्हें मिल रहे आधिकारिक संरक्षण के बीच एक बड़ा अंतर उजागर किया गया है।

READ ALSO  हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मंत्री मोलॉय घटक के खिलाफ समन रद्द करने से इनकार कर दिया

‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ (INTACH) के आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि प्रदेश में कुल 5,416 ऐतिहासिक इमारतें और धरोहरें चिन्हित हैं। हालांकि, इनमें से केवल 421 ही आधिकारिक रूप से संरक्षित हैं:

  • 212 इमारतें उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन हैं।
  • 154 इमारतों का प्रबंधन ASI आगरा के पास है।
  • 55 इमारतों की देखरेख ASI लखनऊ कर रहा है।

याचिका में चेतावनी दी गई है कि शेष 4,995 प्राचीन संरचनाएं जर्जर अवस्था में हैं और सार्वजनिक अधिकारियों की विफलता के कारण पूरी तरह से लुप्त होने की कगार पर हैं।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 70 वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित करने को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया 

जनहित याचिका में विशेष रूप से झांसी, वृंदावन, आगरा, लखनऊ और हस्तिनापुर जैसे ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विरासत संरचनाओं की बिगड़ती स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ‘प्राचीन स्मारक अधिनियम’ के तहत, राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही इन संरचनाओं की रक्षा करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं, चाहे वे वर्तमान में “परित्यक्त” (abandoned) हों या “असुरक्षित” श्रेणी में हों।

याचिका में कहा गया, “यदि कोई संरचना संरक्षित है लेकिन उस पर अतिक्रमण है, तो भी कानून के अनुसार उन अतिक्रमणों को हटाना और स्मारक की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।” इसमें इस बात पर भी जोर दिया गया कि 100 साल से अधिक पुराने कई मंदिर, हवेलियां, घाट और सराय वर्तमान में किसी भी सुरक्षा व्यवस्था के दायरे से बाहर हैं।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि राज्य पुरातत्व विभाग या ASI द्वारा इन 100 साल पुराने ढांचों को संरक्षण सूची में शामिल करने के लिए कोई ठोस प्रस्ताव नहीं दिया गया है, जिससे ये बहुमूल्य सांस्कृतिक संपत्तियां असुरक्षित हो गई हैं।

READ ALSO  चंदा कोचर को अंतरिम राहत से आईसीआईसीआई बैंक को अपूरणीय क्षति होगी, हाईकोर्ट ने कहा; सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ की याचिका खारिज

इन नोटिसों के माध्यम से, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिकारियों को आठ सप्ताह का समय दिया है ताकि वे इन स्थलों के संरक्षण में अपनी विफलता का कारण बताएं और उत्तर प्रदेश के विशाल सांस्कृतिक परिदृश्य को बचाने के लिए भविष्य की योजना पेश करें।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles