भारत के सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानून के शासन (Rule of Law) के गैर-परक्राम्य सिद्धांत संविदात्मक धाराओं की व्याख्या के लिए केंद्रीय हैं, विशेष रूप से तब जब राज्य या उसकी इकाइयां उसमें पक्षकार हों। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसने एक मैनिंग एग्रीमेंट में प्रतिबंधात्मक “डिफ़ॉल्ट” क्लॉज के आधार पर मध्यस्थता पुरस्कार (arbitral award) को शून्य कर दिया था।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि “अनुबंध का एक पक्ष यह तय नहीं कर सकता कि दूसरे पक्ष ने जानबूझकर उल्लंघन किया है या लापरवाही बरती है, खासकर तब जब दूसरा पक्ष अपनी जवाबदेही से इनकार कर रहा हो।”
मामले की पृष्ठभूमि
26 दिसंबर, 2008 को, मेसर्स एबीएस मरीन सर्विसेज (अपीलकर्ता) और अंडमान और निकोबार प्रशासन (प्रतिवादी) के बीच 17 जहाजों के संचालन के लिए एक “मैनिंग एग्रीमेंट” किया गया था। 6 जुलाई, 2009 को, ‘एम.वी. लॉन्ग आइलैंड’ नामक जहाज खराब मौसम के कारण अपने रास्ते से भटक गया और एक जलमग्न चट्टान से टकरा गया। फरवरी 2013 में, प्रशासन ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में 25 सितंबर, 2014 को, जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होने के दंड के रूप में अपीलकर्ता के लंबित बिलों से 2,87,84,305/- रुपये एकतरफा वसूल लिए।
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में इस मामले को मध्यस्थता (Arbitration) के लिए भेजा था। मध्यस्थ, सेवानिवृत्त जस्टिस एस.एस. निज्जर ने फैसला सुनाया कि समझौते का क्लॉज 3.20—जिसमें दावा किया गया था कि प्रशासन का निर्णय अंतिम होगा और उसे कोर्ट या मध्यस्थता में चुनौती नहीं दी जा सकती—भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के तहत शून्य था। मध्यस्थ ने अपीलकर्ता को ब्याज के साथ वसूली गई राशि वापस करने का आदेश दिया।
हालांकि जिला जज ने इस फैसले को बरकरार रखा, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट (पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच) ने इसे यह कहते हुए रद्द कर दिया कि विवाद क्लॉज 3.20 के तहत “अपवादित मामलों” (excepted matters) की श्रेणी में आता है और मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एस. निरंजन रेड्डी ने तर्क दिया कि उल्लंघन और लापरवाही पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र मध्यस्थ के पास है। उन्होंने कहा कि क्लॉज 3.20, कोर्ट और मध्यस्थता दोनों को वर्जित करके अपीलकर्ता को उपचारविहीन बना देगा, और प्रशासन पहले ही मध्यस्थता की प्रक्रिया को स्वीकार कर चुका था।
प्रतिवादी: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल श्री विक्रमजीत बनर्जी ने तर्क दिया कि मध्यस्थ, “समझौते की ही उपज” होने के नाते, उसी समझौते के भीतर किसी धारा की वैधता पर निर्णय नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि क्लॉज 3.20 और 3.22 (मध्यस्थता क्लॉज) मिलकर क्षेत्राधिकार की सीमाएं तय करते हैं, जिसमें डिफ़ॉल्ट पर प्रशासन के अंतिम निर्णय जैसे “अपवादित मामलों” को मध्यस्थता से बाहर रखा गया है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने क्लॉज 3.20 (डिफ़ॉल्ट) और क्लॉज 3.22 (मध्यस्थता) के बीच संबंधों की जांच की। पीठ ने प्रशासन की व्याख्या में कई गंभीर कानूनी खामियां पाईं:
1. कोई भी पक्ष अपने मामले में जज नहीं हो सकता कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रशासन का रुख इस मौलिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है कि कोई भी पक्ष अपने ही मामले में जज नहीं हो सकता। स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम श्री रामेश्वर राइस मिल्स (1987) और जे.जी. इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (2011) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“एक अनुबंध यह प्रावधान नहीं कर सकता कि एक पक्ष यह तय करने के लिए मध्यस्थ होगा कि उसने स्वयं उल्लंघन किया है या दूसरे पक्ष ने। उस प्रश्न का निर्णय केवल एक न्यायनिर्णयन मंच, यानी कोर्ट या मध्यस्थ न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) द्वारा ही किया जा सकता है।”
2. अनुबंध अधिनियम की धारा 28 का उल्लंघन कोर्ट ने कहा कि कोर्ट या मध्यस्थ के समक्ष किसी भी कानूनी कार्यवाही को रोकने वाली धारा शून्य है।
“व्याख्या का एक मौलिक नियम यह है कि ऐसा कोई अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए जिससे कानूनी उपचारों में शून्यता (vacuum) पैदा हो।”
3. ‘अपवादित मामलों’ की अवधारणा कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “अपवादित मामले” आम तौर पर वे होते हैं जहां जवाबदेही स्वीकार कर ली गई हो और केवल राशि का निर्धारण (quantification) बाकी हो। चूंकि अपीलकर्ता ने “लापरवाही” के आरोप का विरोध किया था, इसलिए प्रशासन एकतरफा निर्णय नहीं ले सकता था।
“मामलों को मध्यस्थता से ‘अपवादित’ (excepted) किया जा सकता है… लेकिन इसके परिणामस्वरूप कानूनी उपचारों में शून्यता नहीं आ सकती। कोई मामलों को अपवादित कर सकता है, लेकिन न्याय को वर्जित नहीं कर सकता।”
4. सरकारी अनुबंधों पर टिप्पणी प्रशासन के इस तर्क पर कि उसका निर्णय चुनौती से मुक्त है, पीठ ने “आश्चर्य” व्यक्त किया। जस्टिस विश्वनाथन ने टिप्पणी की कि इस तरह की धाराएं उस समय की याद दिलाती हैं “जब जिसकी लाठी उसकी भैंस (might was right)” का सिद्धांत चलता था। कोर्ट ने राज्य को अनुबंधों में ऐसी धाराएं शामिल न करने की सलाह दी जो कोर्ट के माध्यम से मिलने वाले न्याय के रास्ते बंद करती हों।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जवाबदेही से संबंधित विवाद क्लॉज 3.22 के तहत पूरी तरह से मध्यस्थता के योग्य था। कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क को “गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण” पाया और 8 मई, 2017 के मध्यस्थता पुरस्कार को बहाल कर दिया।
अपील स्वीकार कर ली गई, और लापरवाही के स्वतंत्र न्यायिक निर्धारण के अभाव में अपीलकर्ता से 2.87 करोड़ रुपये की वसूली को अनुचित ठहराया गया।
मामले का विवरण:
- मामले का नाम: मेसर्स एबीएस मरीन सर्विसेज बनाम अंडमान और निकोबार प्रशासन
- सिविल अपील संख्या: 2022 की 3658-3659
- पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
- तारीख: 23 मार्च, 2026

