दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि ई-डोजियर (e-dossier) अपलोड करने में देरी के आधार पर किसी उम्मीदवार की पात्रता तब तक रद्द नहीं की जा सकती, जब तक कि भर्ती प्राधिकरण यह साबित न कर दे कि उम्मीदवार को चयन प्रक्रिया के अनुसार तय माध्यमों से इसकी सूचना दी गई थी।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि भर्ती प्रक्रिया में समय-सीमा का पालन महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे सूचना देने की जिम्मेदारी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। विशेष रूप से तब, जब सरकार की अपनी योजना में एसएमएस (SMS) और ईमेल (Email) के माध्यम से व्यक्तिगत सूचना देने का वादा किया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि
कोर्ट 21 रिट याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई कर रहा था, जो एक ही कानूनी विवाद से जुड़ी थीं। दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) ने विभिन्न पदों के लिए परीक्षाएं आयोजित की थीं। लिखित परीक्षा के बाद, शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों को 10-15 दिनों के भीतर अपने दस्तावेज (ई-डोजियर) ऑनलाइन अपलोड करने थे।
कई उम्मीदवार समय पर दस्तावेज अपलोड नहीं कर पाए, जिसके कारण उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। इसके खिलाफ उम्मीदवारों ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने अधिकांश मामलों में उम्मीदवारों के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
दिल्ली सरकार (याचिकाकर्ता): सरकार का तर्क था कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक और समयबद्ध थी। उनकी मुख्य दलीलें थीं:
- परिणाम नोटिस आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किए गए थे और उम्मीदवारों की जिम्मेदारी थी कि वे नियमित रूप से वेबसाइट चेक करें।
- ओएआरएस (OARS) पोर्टल के रिकॉर्ड के अनुसार, कई उम्मीदवारों को एसएमएस और ईमेल भेजे गए थे।
- अनुच्छेद 14 और 16 के तहत भर्ती प्रक्रिया में समानता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है।
उम्मीदवार (प्रतिवादी): उम्मीदवारों की मुख्य शिकायतें थीं:
- शॉर्टलिस्ट होने के बावजूद उन्हें एडमिट कार्ड और रिजल्ट नोटिस में किए गए वादे के अनुसार कोई व्यक्तिगत एसएमएस या ईमेल प्राप्त नहीं हुआ।
- शुरुआती विज्ञापन में दस्तावेज सत्यापन ऑफलाइन (हार्ड कॉपी) होने की बात कही गई थी और बाद में ई-डोजियर सिस्टम लागू करने की विशिष्ट सूचना उन्हें नहीं मिली।
- “मामूली प्रक्रियात्मक चूक के कारण योग्यता की अनदेखी नहीं होनी चाहिए,” विशेषकर तब जब उम्मीदवार ने अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक अंक प्राप्त किए हों।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने विज्ञापन, एडमिट कार्ड और रिजल्ट नोटिस का बारीकी से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि भर्ती के तरीके में बाद में बदलाव किया गया था:
“विज्ञापन नोटिस का अवलोकन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि शुरू में संबंधित दस्तावेजों की हार्ड कॉपी जमा करने की आवश्यकता थी… यानी प्रक्रिया को पारंपरिक ऑफलाइन मोड में संचालित करने का विचार था, न कि ऑनलाइन तंत्र के माध्यम से।”
अदालत ने जोर देकर कहा कि एडमिट कार्ड के निर्देशों में स्पष्ट था कि सूचना वेबसाइट, ईमेल और एसएमएस के माध्यम से दी जाएगी। बेंच ने कहा कि जब सरकार ऐसी “दोहरी सूचना प्रणाली” अपनाती है, तो यह उम्मीदवार के मन में एक वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) पैदा करती है:
“एक बार जब सरकार अपने आधिकारिक दस्तावेजों में यह दर्शाती है कि उम्मीदवारों को व्यक्तिगत रूप से एसएमएस और ईमेल द्वारा सूचित किया जाएगा, तो संचार तभी पूर्ण माना जाएगा जब वेबसाइट पर नोटिस अपलोड होने के साथ-साथ उम्मीदवारों को व्यक्तिगत माध्यमों से भी सूचित किया जाए।”
प्रभावी सूचना के सिद्धांत पर हाईकोर्ट ने कहा:
“प्रक्रिया के इलेक्ट्रॉनिक होने मात्र से प्रभावी सूचना देने का सिद्धांत कमज़ोर नहीं हो जाता… केवल वेबसाइट पर सामान्य नोटिस देना पर्याप्त नहीं था, विशेषकर तब जब भर्ती के ढांचे में उम्मीदवारों को यह नहीं बताया गया था कि उन्हें केवल वेबसाइट के माध्यम से सूचित किया जाएगा।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना भेजने का सबूत देने की जिम्मेदारी भर्ती प्राधिकरण की है:
“प्राधिकरण को रिकॉर्ड या विश्वसनीय साक्ष्य के माध्यम से यह प्रदर्शित करने की स्थिति में होना चाहिए कि उम्मीदवार को निर्धारित तरीके से सूचित करने के लिए उचित कदम उठाए गए थे। ऐसे सबूतों के अभाव में, कोर्ट चयन बोर्ड के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के लिए उचित होगा।”
उम्मीदवारी रद्द होने के गंभीर परिणामों पर बेंच ने टिप्पणी की:
“कई उम्मीदवारों के लिए, सरकारी नौकरी वर्षों की तैयारी, वित्तीय निवेश और व्यक्तिगत बलिदान का प्रतिनिधित्व करती है। तकनीकी आधार पर अंतिम चरण में अयोग्य घोषित करना न केवल पेशेवर भविष्य को प्रभावित करता है, बल्कि उम्मीदवार की मनोवैज्ञानिक और आर्थिक स्थिरता को भी चोट पहुँचाता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने सूचना के साक्ष्यों के आधार पर 21 मामलों में अलग-अलग फैसले सुनाए:
- सरकार की याचिकाएं स्वीकार (अयोग्यता बरकरार): उन मामलों में जहां सरकार ने ओएआरएस पोर्टल का रिकॉर्ड पेश किया कि एसएमएस और ईमेल सही पते पर समय पर भेजे गए थे, कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया (उदाहरण: W.P.(C) 938/2026 और W.P.(C) 14309/2025)।
- सरकार की याचिकाएं खारिज (पात्रता बहाल): कोर्ट ने 17 मामलों में सरकार की याचिकाओं को खारिज कर दिया जहाँ:
- एसएमएस/ईमेल भेजने का कोई सबूत नहीं था।
- सूचना बहुत देर से भेजी गई थी (उदाहरण के लिए, अन्य उम्मीदवारों को मिले 30 दिनों के मुकाबले कुछ उम्मीदवारों को केवल 8-9 दिन का समय मिला)।
- रिजल्ट नोटिस में गलतियां थीं जिन्हें अपलोडिंग विंडो के बीच में सुधारा गया था।
कुल मिलाकर, सरकार की 17 याचिकाएं खारिज कर दी गईं (उम्मीदवारों के पक्ष में) और 4 याचिकाओं में सरकार के फैसले को सही माना गया।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी दिल्ली और अन्य बनाम सहदेव और अन्य (और संबंधित मामले)
- केस संख्या: W.P.(C) 938/2026 और संबंधित मामले
- पीठ: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन
- निर्णय की तिथि: 20 मार्च, 2026

