सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर एक संपत्ति पर कब्जा कराने के लिए धमकियां दिलवाने का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों के लिए संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना उचित उपाय है। बाद में याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल को लगातार धमकियां मिल रही हैं, जिसके चलते वह कर्नाटक लौटने में असमर्थ हैं और फिलहाल दिल्ली में रह रहे हैं।
पीठ ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या मुख्यमंत्री के लोग दिल्ली तक उनका पीछा कर रहे हैं। इस पर वकील ने स्पष्ट किया कि खतरा केवल कर्नाटक में है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि कई बार पुलिस में शिकायत दर्ज कराने और अदालत से आदेश मिलने के बावजूद स्थिति नहीं बदली। वकील ने जनवरी की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि संबंधित संपत्ति पर पथराव हुआ और कुछ लोगों ने तोड़फोड़ की। उनका आरोप था कि यह सब संपत्ति पर कब्जा करने की मंशा से किया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जब मामला कर्नाटक से जुड़ा है तो याचिकाकर्ता ने वहां के हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया। इस पर वकील ने कहा कि धमकियों के कारण उनके मुवक्किल के लिए राज्य में प्रवेश करना ही मुश्किल हो गया है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि मामला कहीं न कहीं “राजनीतिक लड़ाई” जैसा प्रतीत होता है, जिसे न्यायालय के समक्ष लाया गया है। हालांकि, वकील ने इस बात से इनकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का राजनीति से कोई संबंध नहीं है।
अंततः जब पीठ ने याचिका पर विचार करने में अनिच्छा जताई, तो याचिकाकर्ताओं ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाईकोर्ट में उचित राहत लेने की स्वतंत्रता दी।

