बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि असिस्टेंट लॉ ऑफिसर्स (ग्रेड-II) की नियुक्ति को केवल इस आधार पर अनंतिम (provisional) या अस्थायी नहीं माना जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) लंबित है। जस्टिस एस. एम. मोदक और जस्टिस संदीप वी. मारणे की डिवीजन बेंच ने तीन अधिकारियों को बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के नियमित कर्मचारी घोषित किया और निगम को उनकी पदोन्नति (promotion) पर विचार करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पल्लवी खाले, नीता जाधव और पूजा स्वप्निल यादव को दिसंबर 2016 में एक नियमित भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से असिस्टेंट लॉ ऑफिसर (ग्रेड-II) के रूप में नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने अपनी तीन साल की परिवीक्षा अवधि (probation period) पूरी कर ली और सात साल की सेवा भी दे दी, इसके बावजूद निगम ने उनकी नियुक्ति को ‘अनंतिम’ या ‘अस्थायी’ माना।
निगम ने उनकी नियुक्ति पत्र में एक शर्त का हवाला दिया था, जिसके अनुसार उनकी सेवा सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिका संख्या 8394/2013 के परिणाम के अधीन थी। यह एसएलपी (SLP) 2012 के बॉम्बे हाईकोर्ट के एक पूर्ण पीठ (Full Bench) के फैसले से संबंधित है, जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया के उन नियमों को बरकरार रखा गया था जो वेतनभोगी कानून अधिकारियों (salaried law officers) को अदालत में अपने नियोक्ता का प्रतिनिधित्व करने से रोकते हैं। नगर निगम ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगी हुई है।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उनकी नियुक्ति एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया के माध्यम से हुई है और उनकी सेवा बेदाग रही है। उन्होंने तर्क दिया कि नियुक्ति पत्र की शर्त अनुचित है और लंबित मुकदमेबाजी के आधार पर उन्हें स्थायी कर्मचारी के लाभों और असिस्टेंट लॉ ऑफिसर के पद पर पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, नगर निगम (MCGM/BMC) ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने नियुक्ति के समय इन शर्तों को स्वीकार किया था और वे इस संबंध में हलफनामा (undertaking) भी दे चुके हैं। निगम का कहना था कि याचिकाकर्ताओं को स्थायी कर्मचारी मानने की कोई बाध्यता नहीं है। इसके अलावा, निगम ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ताओं ने 2023 में सीधी भर्ती परीक्षा में भाग लिया था लेकिन वे सफल नहीं हुए, इसलिए वे नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकते।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया और कानून अधिकारियों के कार्यों की समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि पूरी चयन प्रक्रिया का पालन किया गया था, जिसमें सार्वजनिक विज्ञापन और योग्यता परीक्षण शामिल थे। बेंच ने गौर किया कि याचिकाकर्ताओं ने तीन साल की परिवीक्षा अवधि बिना किसी रुकावट के पूरी की है।
नियुक्ति आदेशों का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“सभी शर्तें वैसी ही हैं जैसी आमतौर पर उन कर्मचारियों के नियुक्ति आदेशों में होती हैं जिन्हें निकट भविष्य में शर्तों को पूरा करने पर स्थायी रूप से नियुक्त किया जाना होता है।”
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के प्रभाव पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि असिस्टेंट लॉ ऑफिसर्स केवल अदालतों में उपस्थित होने के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, जैसे समझौते तैयार करना, लीज डीड और कानूनी राय देना। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:
“भले ही सुप्रीम कोर्ट इस हाईकोर्ट के पूर्ण पीठ के फैसले को बरकरार रखता है, फिर भी याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति स्वतः ही अवैध नहीं हो जाएगी।”
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि मुंबई जैसे बड़े शहर में चल रही विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए निगम को कानूनी विशेषज्ञों की निरंतर आवश्यकता है।
कोर्ट का निर्णय
बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को उनकी नियुक्ति की तारीख से नियमित असिस्टेंट लॉ ऑफिसर (ग्रेड-II) घोषित किया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“सभी कारकों पर विचार करने के बाद, हमें लगता है कि याचिकाकर्ताओं ने नियमित रूप से नियुक्त माने जाने का मामला सिद्ध किया है। भले ही यह मान लिया जाए कि निगम शुरू में नियुक्तियों को अनंतिम रखने के लिए उचित था, लेकिन समय बीतने के बाद याचिकाकर्ता निश्चित रूप से राहत पाने के हकदार हैं।”
बेंच ने नगर निगम को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को वे सभी सेवा लाभ दिए जाएं जो एक स्थायी कर्मचारी को मिलते हैं। साथ ही, कोर्ट ने निगम को आदेश दिया कि जब भी अवसर आए, इन अधिकारियों की असिस्टेंट लॉ ऑफिसर के पद पर पदोन्नति के लिए विचार किया जाए, क्योंकि उन्होंने 5 साल की पात्रता सेवा पूरी कर ली है।
केस विवरण
केस का शीर्षक: पल्लवी खाले और अन्य बनाम बृहन्मुंबई नगर निगम और अन्य
केस संख्या: रिट याचिका संख्या 714/2024
बेंच: जस्टिस एस. एम. मोदक और जस्टिस संदीप वी. मारणे
दिनांक: 24 अप्रैल 2026

