बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह माना है कि जैविक मां के पास नाबालिग बच्चे की कस्टडी को केवल इसलिए “अवैध” नहीं माना जा सकता क्योंकि किसी विदेशी अदालत ने उसके विपरीत आदेश पारित किए हैं। जस्टिस सारंग वी. कोटवाल और जस्टिस संदेश डी. पाटिल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय अभिभावक विवादों के मामलों में “बच्चे का सर्वोत्तम हित” ही सर्वोपरि विचार है, जो ‘फर्स्ट स्ट्राइक’ सिद्धांत (पहले अदालत जाने का सिद्धांत) और अंतरराष्ट्रीय अदालतों के प्रति सम्मान की अवधारणा (Comity of Courts) से ऊपर है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (पिता) और प्रतिवादी नंबर 2 (मां), दोनों अमेरिकी नागरिक हैं। उनका विवाह 2008 में हुआ और 2019 में वे यूके (UK) चले गए। उनके बेटे ‘N’ का जन्म 2014 में अमेरिका में हुआ था। वैवाहिक संबंधों में कड़वाहट आने के बाद, जुलाई 2023 में मां बच्चे के साथ भारत लौट आई।
इसके बाद, पिता ने इंग्लैंड के हाईकोर्ट (High Court of Justice, Family Division) का दरवाजा खटखटाया, जिसने बच्चे को अदालत का वार्ड घोषित कर उसे यूके वापस लाने का आदेश दिया। पिता ने इन आदेशों के आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर कर आरोप लगाया कि बच्चा भारत में अवैध हिरासत में है। दूसरी ओर, मां ने मुंबई के बांद्रा स्थित फैमिली कोर्ट में तलाक और बच्चे की कस्टडी के लिए कार्यवाही शुरू कर दी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से: वकील सुश्री अवनी बंसल ने तर्क दिया कि बच्चा यूके का ‘नियमित निवासी’ था और उसे विदेशी अदालती आदेशों का उल्लंघन कर “गलत तरीके से” हटाया गया है। उन्होंने जोर दिया कि बच्चे के भविष्य, उसकी स्वास्थ्य देखभाल और यूके-यूएस की दोहरी नागरिकता की संभावनाओं के लिए उसका वापस यूके जाना ही बेहतर होगा।
प्रतिवादी नंबर 2 (मां) की ओर से: वकील श्री वेस्ली मेनेजेस ने दलील दी कि मां को यूके छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि वहां के गृह कार्यालय (Home Office) ने उसका वीजा रद्द कर दिया था। यह कार्रवाई पिता द्वारा उनके अलग होने की सूचना देने के बाद की गई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पिता ने बच्चे के अमेरिकी पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने से इनकार कर दिया, जो दर्शाता है कि वह बच्चे के हितों की अनदेखी कर रहे हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने चैंबर में नाबालिग बच्चे से बात की और पाया कि वह अपनी मां के साथ भारत में रहने की स्पष्ट इच्छा रखता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले नित्या आनंद राघवन बनाम दिल्ली राज्य व अन्य का हवाला दिया।
- वैध कस्टडी का अनुमान: हाईकोर्ट ने पाया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में मुख्य सवाल यह होता है कि क्या कस्टडी अवैध है। खंडपीठ ने कहा: “प्रतिवादी कोई और नहीं बल्कि नाबालिग की जैविक मां होने के नाते उसकी प्राकृतिक अभिभावक है… यह माना जा सकता है कि मां के पास नाबालिग की कस्टडी वैध है।”
- विदेशी आदेशों की स्थिति: यूके की अदालत के आदेशों पर हाईकोर्ट ने कहा: “सिर्फ इसलिए कि विदेशी अदालत ने आदेश पारित किया है, नाबालिग की कस्टडी अपने आप में अवैध नहीं हो जाएगी।” कोर्ट ने माना कि विदेशी आदेश के उल्लंघन मात्र से भारत में मां की कस्टडी “अवैध” नहीं हो जाती।
- ‘फर्स्ट स्ट्राइक’ सिद्धांत की अस्वीकृति: कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि जो पक्ष पहले अदालत जाता है उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय अदालतें ‘गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890’ के तहत बच्चे के कल्याण से निर्देशित होती हैं।
- प्रवास और व्यावहारिक कठिनाइयां: हाईकोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि पिता की अपनी शिकायतों के कारण ही मां का यूके वीजा रद्द हुआ। कोर्ट ने कहा कि यदि मां को यूके लौटने पर मजबूर किया गया, तो वह “पूरी तरह से याचिकाकर्ता की दया पर” निर्भर हो जाएगी, जिससे बच्चे को “अपूरणीय भावनात्मक क्षति” हो सकती है।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए निष्कर्ष निकाला कि मां के साथ बच्चे का भारत में रहना गैरकानूनी नहीं है। खंडपीठ ने माना कि पिता का आचरण, विशेष रूप से पासपोर्ट नवीनीकरण में सहयोग न करना, यह दर्शाता है कि वह बच्चे के सर्वोत्तम हित में कार्य नहीं कर रहे थे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बांद्रा फैमिली कोर्ट इस मामले के गुण-दोष पर निर्णय लेने के लिए उचित मंच है।
अदालत ने निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट इस फैसले में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से कस्टडी के मामले का फैसला करे।
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: डॉ. श्रेयस दिलीप मांद्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल रिट पिटीशन नंबर 3950/2023
- पीठ: जस्टिस सारंग वी. कोटवाल और जस्टिस संदेश डी. पाटिल
- निर्णय की तिथि: 29 अप्रैल, 2026

