BNS में कानूनी शून्यता: अप्राकृतिक यौन शोषण के खिलाफ सुरक्षा पर दिल्ली हाईकोर्ट ने बहाल की PIL

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को देश की नई दंड संहिता में एक गंभीर कानूनी कमी को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। अदालत ने उस जनहित याचिका (PIL) को बहाल कर दिया है, जिसमें गैर-सहमति वाले अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने की मांग की गई है।

चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से हो रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि पिछले डेढ़ साल से इस मुद्दे पर सरकार का कोई फैसला “कहीं नजर नहीं आ रहा है।”

गंतव्य गुलाटी द्वारा दायर इस याचिका में 1 जुलाई, 2024 से लागू हुई भारतीय न्याय संहिता (BNS) के कारण उत्पन्न कानूनी संकट को रेखांकित किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि BNS में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के समान कोई प्रावधान नहीं है।

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गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त करते हुए वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। हालांकि, यह धारा अभी भी गैर-सहमति वाले अप्राकृतिक यौन शोषण, नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों और पशुगमन (bestiality) के खिलाफ कार्रवाई का मुख्य कानूनी आधार थी। याचिका के अनुसार, BNS में इसकी कमी ने विशेष रूप से LGBTQ समुदाय और अन्य कमजोर वर्गों को कानूनी सुरक्षा से वंचित कर दिया है।

यह मामला पहले अगस्त 2024 में इस निर्देश के साथ निस्तारित किया गया था कि केंद्र सरकार छह महीने के भीतर याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर निर्णय ले। समय सीमा बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर हाईकोर्ट ने केस को दोबारा खोलने का निर्णय लिया।

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खंडपीठ ने कहा, “अदालत ने 28 अगस्त, 2024 को प्रतिवेदन पर विचार करने और निर्णय लेने का निर्देश दिया था। डेढ़ साल का समय किसी भी निर्णय के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। लेकिन, फैसला कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। इसे देखते हुए, रिट याचिका को उसकी मूल संख्या पर बहाल किया जाता है।”

केंद्र सरकार के वकील ने दलील दी कि यह एक “संवेदनशील मुद्दा” है और इसके लिए विभिन्न हितधारकों से सुझाव मांगे गए हैं। सरकार का कहना है कि इस नए कानूनी परिप्रेक्ष्य पर “समग्र दृष्टिकोण” अपनाने में समय लगेगा।

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हाईकोर्ट ने अब केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर एक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इस हलफनामे में सरकार को यह बताना होगा कि अगस्त 2024 के अदालती आदेश के अनुपालन में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई मई के लिए निर्धारित की है, जिसमें कानून की इस संभावित कमी को दूर करने की दिशा में सरकार की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।

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