ऑपरेशन सिंदूर पर टिप्पणी का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर महमूदाबाद के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही बंद करने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अशोक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को बंद करने का निर्देश दिया है। यह मामला पाकिस्तान के खिलाफ सीमा पार सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से संबंधित उनके सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा था। हरियाणा सरकार ने कोर्ट के सुझाव को स्वीकार करते हुए “एकमुश्त उदारता” (one-time magnanimity) के तौर पर मुकदमे के लिए जरूरी मंजूरी (sanction) देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया।

सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने सोनीपत के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के समक्ष लंबित मामले को समाप्त करने का आदेश दिया।

हरियाणा सरकार ने दिखाई ‘उदारता’

कानूनी विवाद का यह समाधान तब निकला जब कोर्ट ने 6 जनवरी को सुझाव दिया था कि राज्य सरकार इस मामले में मुकदमे की आवश्यकता पर पुनर्विचार करे। हरियाणा सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने बेंच को बताया कि राज्य ने इसे “बंद अध्याय” (closed chapter) के रूप में मानने का निर्णय लिया है।

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बेंच ने अपने आदेश में दर्ज किया, “राज्य ने बहुत शालीनता के साथ, एकमुश्त उदारता दिखाते हुए, अभियोजन के लिए मंजूरी नहीं देने का फैसला किया है। इसके परिणामस्वरूप, सोनीपत की अदालत में लंबित कार्यवाही को अभियोजन के अभाव में बंद करने का निर्देश दिया जाता है।”

कार्यवाही बंद करने पर सहमति जताते हुए, ASG ने कोर्ट से अनुरोध किया कि महमूदाबाद भविष्य में इस तरह के कृत्यों में शामिल न हों। इस पर बेंच ने प्रोफेसर के आचरण पर विश्वास जताते हुए कहा कि वह एक “अत्यंत विद्वान प्रोफेसर और विषय विशेषज्ञ” हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “हम सभी जिम्मेदार नागरिक हैं, लेकिन कभी-कभी स्थिति इतनी संवेदनशील हो जाती है। हम खुली अदालत में इस पर कोई चर्चा नहीं चाहते, क्योंकि बातों के गलत अर्थ निकाले जा सकते हैं।”

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी संदर्भ

प्रोफेसर महमूदाबाद को मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बारे में उनके फेसबुक पोस्ट के बाद गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप था कि सैन्य संयम और “दिखावटी देशभक्ति” (performative patriotism) पर उनकी टिप्पणियां आपराधिक श्रेणी में आती हैं।

इस मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी थी, जिनमें शामिल हैं:

  • धारा 196: विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना।
  • धारा 197: राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले दावे।
  • धारा 353: सार्वजनिक उपद्रव से संबंधित बयान।
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भारतीय कानून के अनुसार, इन विशिष्ट अपराधों के लिए केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना ट्रायल शुरू नहीं किया जा सकता है। SIT ने 22 अगस्त 2025 को इस मंजूरी के लिए आवेदन किया था।

अंतिम निर्देश

महमूदाबाद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट की टिप्पणियों को स्वीकार करते हुए कहा कि उनके मुवक्किल के लिए यह “पर्याप्त संकेत” है। कार्यवाही बंद होने के साथ ही, कोर्ट से महमूदाबाद का पासपोर्ट वापस करने का अनुरोध किया गया, जो अंतरिम जमानत की शर्त के रूप में ट्रायल कोर्ट में जमा था।

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर के खिलाफ दो में से एक मामले की कार्यवाही को रद्द कर दिया था और SIT की सिफारिश के बाद दूसरे मामले पर भी रोक लगा दी थी, क्योंकि दोनों मामलों में आरोप समान थे।

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