औद्योगिक विवाद अधिनियम में ‘उद्योग’ की परिभाषा पर 17 मार्च से सुनवाई करेगी सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की संविधान पीठ

सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ 17 मार्च से औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में प्रयुक्त “उद्योग” शब्द की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न पर सुनवाई शुरू करेगी। इस मामले के श्रम कानून और सरकारी संस्थानों की गतिविधियों पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यसूची के अनुसार यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सुना जाएगा। पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी को इस मामले में कुछ प्रमुख कानूनी प्रश्न तय किए थे, जिन पर संविधान पीठ विचार करेगी। इनमें सबसे अहम प्रश्न यह है कि बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड मामले में न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्णा अय्यर द्वारा अपने मत के पैरा 140 से 144 में निर्धारित किया गया परीक्षण क्या यह तय करने के लिए सही कानून है कि कोई संस्था या उद्यम “उद्योग” की परिभाषा में आता है या नहीं।

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इसके अलावा अदालत यह भी देखेगी कि औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 और औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 का “उद्योग” शब्द की व्याख्या पर कोई कानूनी प्रभाव पड़ता है या नहीं।

संविधान पीठ के सामने यह प्रश्न भी रखा गया है कि क्या सरकारी विभागों या उनकी संस्थाओं द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण योजनाएँ और गतिविधियाँ भी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2 के तहत “औद्योगिक गतिविधि” मानी जा सकती हैं।

अदालत ने पक्षकारों को अपने लिखित तर्कों को अद्यतन करने या नए समेकित लिखित प्रतिवेदन दाखिल करने के लिए 28 फरवरी तक का समय दिया था। सुनवाई 17 मार्च से शुरू होकर 18 मार्च तक पूरी किए जाने की संभावना है।

यह विवाद कई वर्षों से न्यायालयों में विचाराधीन है। वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस प्रश्न को उसके “गंभीर और व्यापक प्रभाव” को देखते हुए नौ-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया था।

इससे पहले मई 2005 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 में “उद्योग” की परिभाषा की व्याख्या से जुड़े मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजा था। पीठ ने कहा था कि इस प्रश्न के सभी कानूनी पहलुओं की गहराई से समीक्षा करना आवश्यक है।

अपने आदेश में पीठ ने यह भी उल्लेख किया था कि “उद्योग” की परिभाषा में संशोधन तो किया गया, लेकिन वह संशोधन 23 वर्षों तक लागू नहीं किया गया। अदालत ने कहा था कि नियोक्ताओं और कर्मचारियों के हितों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धी मांगें तथा संशोधन को लागू करने में विधायिका और कार्यपालिका की असमर्थता इस मुद्दे को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने का कारण बनी।

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मामला मूल रूप से तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 1996 और 2001 के दो फैसलों के बीच स्पष्ट विरोधाभास पाया। 1996 के निर्णय में अदालत ने 1978 की सात-न्यायाधीशों की पीठ के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा था कि सामाजिक वानिकी विभाग “उद्योग” की परिभाषा में शामिल होगा। हालांकि 2001 में दो-न्यायाधीशों की पीठ ने इस प्रश्न पर अलग दृष्टिकोण अपनाया, जिसके बाद मामला बड़ी पीठ को भेजा गया।

अब नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर अंतिम रूप से विचार करेगी, जिससे यह तय हो सकेगा कि किन प्रकार की गतिविधियाँ या संस्थाएँ औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत “उद्योग” मानी जाएँगी।

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