इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जातिगत अपमान और सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोपी एक ठेकेदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश को रद्द कर दिया है। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्देश जारी करते हुए अपनी रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि भविष्य में “लोअर कोर्ट” (Lower Court) या “कोर्ट बिलो” (Court Below) जैसे शब्दों का उपयोग बंद किया जाए और उनके स्थान पर “ट्रायल कोर्ट” (Trial Court) या “स्पेशल कोर्ट” (Special Court) शब्दों का प्रयोग किया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 28 जून 2025 को जिला पंचायत, महोबा में निविदा (tender) प्रक्रिया के दौरान हुई एक कथित घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता जय प्रकाश अनुरागी, जो जिला पंचायत के अध्यक्ष हैं, ने एफ.आई.आर. दर्ज कराई थी कि महेश तिवारी (अपीलकर्ता) और उनके साथियों ने निविदा प्रक्रिया में व्यवधान डाला। आरोप था कि तिवारी ने एक कर्मचारी के साथ धक्का-मुक्की की और अन्य आरोपियों ने शिकायतकर्ता को पकड़कर जातिसूचक गालियां दीं।
इसके बाद, विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट), महोबा ने स्पेशल केस नंबर 86/2025 में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और SC/ST एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत अपीलकर्ता को समन जारी किया था।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक रूप से प्रेरित है ताकि अपीलकर्ता को निविदा प्रक्रिया में भाग लेने से रोका जा सके। उन्होंने एफ.आई.आर. में 24 घंटे की देरी और शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास की ओर कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया।
वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराते हुए तर्क दिया कि जांच में प्रथम दृष्टया मामला बनता है। उन्होंने State of Gujarat Versus Afroz Mohammed Hasanfatta (2019) के मामले का हवाला देते हुए कहा कि समन आदेश वैध जांच पर आधारित है, इसलिए इसे रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
मेरिट पर हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला “अंतर्निहित विसंगतियों” से भरा हुआ है। हाईकोर्ट ने गौर किया कि शिकायतकर्ता, जो एक जिम्मेदार सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति हैं, ने तीन अलग-अलग बयानों में अपनी कहानी बदली। शुरू में शिकायतकर्ता ने अंकित शुक्ला का नाम लिया था, लेकिन बाद में सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद उसे निर्दोष बताते हुए कहा कि उसने व्यक्ति को पहचानने में गलती कर दी थी।
सीसीटीवी फुटेज का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि वीडियो में सभी पक्ष सामान्य व्यवहार करते दिख रहे हैं और वहां किसी प्रकार की हाथापाई या गंभीर विवाद नजर नहीं आया। हाईकोर्ट ने कहा:
“उनके (शिकायतकर्ता के) बयानों में लगातार बदलाव और अपने प्रत्यक्षदर्शी विवरण के बजाय इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर उनकी बढ़ती निर्भरता, अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा करती है।”
हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि हालांकि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य स्वीकार्य हैं, लेकिन उनका उपयोग मूल प्रत्यक्षदर्शी बयानों से पूरी तरह विचलित होने के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर जब इससे पूरी कहानी संदिग्ध हो जाती हो।
कानूनी शब्दावली पर निर्देश
निर्णय का एक बड़ा हिस्सा न्यायपालिका और रजिस्ट्री द्वारा उपयोग की जाने वाली शब्दावली पर केंद्रित रहा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश Sakhawat and Another v. State of U.P. (2024) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि “कोर्ट बिलो” विशेष न्यायालयों के लिए सही कानूनी शब्दावली नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा:
“यह उचित होगा कि इस हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ट्रायल कोर्ट्स (Trial Courts) को ‘लोअर कोर्ट्स’ (Lower Courts) के रूप में संबोधित करना बंद करे। यहां तक कि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड को भी ‘लोअर कोर्ट रिकॉर्ड’ (LCR) के बजाय ‘ट्रायल कोर्ट रिकॉर्ड’ (TCR) कहा जाना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि “कोर्ट बिलो” (Court Below) शब्द को “ट्रायल कोर्ट” (Trial Court) या संबंधित अदालत, जैसे कि “एससी/एसटी एक्ट के तहत स्पेशल कोर्ट” (Special Court) से बदला जाए।
निर्णय
यह निष्कर्ष निकालते हुए कि अभियोजन की कहानी में किए गए सुधार और विसंगतियां कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं हैं, हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 के समन आदेश को निरस्त कर दिया और महोबा में लंबित पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
प्रशासनिक निर्देशों के संबंध में हाईकोर्ट ने आदेश दिया:
“इस आदेश की एक प्रति केवल इस उद्देश्य (शब्दावली के क्रियान्वयन) के लिए रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष रखी जाए, ताकि सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों को प्रशासनिक स्तर पर लागू किया जा सके।”
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: महेश तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर 11406/2025
- पीठ: जस्टिस अब्दुल शाहिद
- दिनांक: 24 अप्रैल, 2026

