गुरुग्राम तोड़फोड़ अभियान: सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार, याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुरुग्राम में चल रहे अतिक्रमण विरोधी और तोड़फोड़ अभियान के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमालया बागची की पीठ ने इस मामले का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की छूट दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाईकोर्ट की प्राथमिक भूमिका को रेखांकित किया। साथ ही, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि वे आज ही दोपहर 1:00 बजे या लंच के तुरंत बाद 1:45 बजे इस मामले पर सुनवाई करें।

यह कानूनी विवाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा 2 अप्रैल को दिए गए एक अंतरिम आदेश से उपजा है। उस आदेश में हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार की ‘स्टिल्ट-प्लस-फोर’ (stilt-plus-four) बिल्डिंग पॉलिसी पर रोक लगा दी थी। इस नीति के तहत स्टिल्ट पार्किंग के ऊपर चार आवासीय मंजिलें बनाने की अनुमति दी गई थी, जबकि पहले इसकी सीमा केवल तीन मंजिल तक थी।

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हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए जनता की सुरक्षा को जोखिम में डाल रही है। इसी आदेश के बाद, गुरुग्राम प्रशासन ने शहरी क्षेत्रों में अवैध निर्माणों के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू कर दिया था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने पीठ के समक्ष तर्क दिया कि स्थानीय अधिकारी हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश का गलत अर्थ निकाल रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि इस अभियान की आड़ में आम निवासियों के “पूरी तरह से वैध निर्माणों” को भी तोड़ा जा रहा है।

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वकील ने यह आरोप भी लगाया कि प्रशासन बिना किसी ‘कारण बताओ नोटिस’ (show-cause notice) के तोड़फोड़ की कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि निवासियों को हाईकोर्ट जाने का समय देने के लिए तीन से चार दिनों तक यथास्थिति (status quo) बनाए रखने का आदेश दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। अधिकारियों द्वारा अदालती आदेशों की गलत व्याख्या के आरोपों पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा:

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“यदि हाईकोर्ट अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन करते हुए अनधिकृत निर्माणों को रोकने या हटाने के लिए अभियान चला रहा है, तो एक शीर्ष संस्था के रूप में हमें इसमें बाधा क्यों डालनी चाहिए?”

पीठ ने जोर देकर कहा कि यदि हाईकोर्ट के आदेश का गलत इस्तेमाल हो रहा है, तो इसका समाधान भी हाईकोर्ट में ही होना चाहिए। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतरिम राहत देने के बजाय याचिकाकर्ताओं को तत्काल हाईकोर्ट में अपनी बात रखने का निर्देश दिया।

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