सुप्रीम कोर्ट ने प्रशिक्षण के दौरान चोट या दिव्यांगता के कारण बाहर किए गए सैन्य कैडेट्स को आर्थिक सहायता देने के मुद्दे पर हो रही देरी पर गंभीर नाराजगी जताई है। अदालत ने मंगलवार को चेतावनी दी कि यदि रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय इस मामले में जल्द निर्णय नहीं लेते हैं तो रक्षा सचिव और वित्त सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने के लिए बुलाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ इस विषय पर स्वतः संज्ञान लेकर चल रहे मामले की सुनवाई कर रही थी। यह मामला उन कैडेट्स की कठिनाइयों से जुड़ा है जिन्हें प्रशिक्षण के दौरान लगी चोट या दिव्यांगता के कारण सैन्य संस्थानों से बाहर कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि संबंधित मंत्रालयों को इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए छह सप्ताह का समय दिया गया था, लेकिन अब तक कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि स्थिति में कोई प्रगति नहीं होती है तो वह रक्षा सचिव और वित्त सचिव की उपस्थिति का आदेश देने को बाध्य होगी।
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत से कुछ और समय देने का अनुरोध किया। उन्होंने बताया कि सेना, नौसेना और वायुसेना—तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने कैडेट्स की स्थिति सुधारने के लिए कई सुझाव दिए हैं, लेकिन अभी तक संबंधित मंत्रालयों ने इस पर अंतिम निर्णय नहीं लिया है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह ऐसा मुद्दा है जिसमें रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय दोनों के बीच समन्वय आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि दोनों मंत्रालयों की संयुक्त बैठक से इस मामले का समाधान निकल सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में आवश्यक वित्तीय प्रावधान बजट प्रक्रिया के दौरान किए जा सकते हैं क्योंकि अभी वित्त अधिनियम 2026 पारित नहीं हुआ है। अदालत ने भी कहा कि जब वित्त अधिनियम 2026 विचाराधीन है, तब यह समय इन कैडेट्स की आर्थिक आवश्यकताओं के लिए जरूरी खर्च का आकलन करने का उपयुक्त अवसर है।
मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च को निर्धारित की गई है।
इससे पहले, पिछले वर्ष 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सशस्त्र बलों को ऐसे “बहादुर कैडेट्स” चाहिए जो प्रशिक्षण के दौरान लगी चोट या दिव्यांगता से हतोत्साहित न हों। अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा था कि प्रशिक्षण ले रहे कैडेट्स के लिए किसी प्रकार की बीमा व्यवस्था, जैसे समूह बीमा, लागू करने की संभावना पर विचार किया जाए ताकि मृत्यु या दिव्यांगता जैसी परिस्थितियों में उन्हें सुरक्षा मिल सके।
अदालत ने यह भी पूछा था कि प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग हुए कैडेट्स को दी जाने वाली मौजूदा ₹40,000 की एकमुश्त राशि को बढ़ाने की संभावना पर भी विचार किया जाए ताकि उनके इलाज और अन्य चिकित्सा जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके।
सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया था कि इन कैडेट्स को एक्स-सर्विसमैन कॉन्ट्रिब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ECHS) का लाभ देने से संबंधित एक फाइल मंत्रालय द्वारा मंजूर की जा चुकी है, लेकिन अभी तक उसे लागू नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा था कि ऐसे कैडेट्स के लिए पुनर्वास की योजना तैयार करने पर विचार किया जाए ताकि उपचार के बाद उन्हें रक्षा सेवाओं से जुड़े किसी डेस्क जॉब या अन्य कार्य में समायोजित किया जा सके।
यह मामला अगस्त पिछले वर्ष तब सामने आया जब अदालत ने एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि नेशनल डिफेंस अकादमी (NDA) और इंडियन मिलिट्री अकादमी (IMA) जैसे प्रतिष्ठित सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों से प्रशिक्षण के दौरान लगी दिव्यांगता के कारण कई कैडेट्स को मेडिकल आधार पर बाहर कर दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, 1985 से अब तक लगभग 500 अधिकारी कैडेट्स विभिन्न स्तर की दिव्यांगता के कारण प्रशिक्षण संस्थानों से बाहर किए जा चुके हैं। इनमें से कई कैडेट्स आज भी भारी चिकित्सा खर्चों का सामना कर रहे हैं, जबकि उन्हें मिलने वाली आर्थिक सहायता उनकी जरूरतों के मुकाबले काफी कम बताई गई है।

