सोनम वांगचुक की एनएसए के तहत गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट 17 मार्च को सुनाएगा आदेश, भाषणों के वीडियो देखेगा कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के भाषणों के वीडियो देखेगा और इसके बाद उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत की गई हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला करेगा। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने मामले की अंतिम सुनवाई 17 मार्च को तय करते हुए कहा कि उस दिन बहस पूरी होने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया जाएगा।

सुनवाई के दौरान अदालत ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वांगचुक के भाषणों के वीडियो अदालत में दिखाने की व्यवस्था की जाए। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने कहा कि दोनों न्यायाधीश पहले वीडियो अलग-अलग देखेंगे और उसके बाद संयुक्त रूप से भी उनका अवलोकन करेंगे।

पीठ ने कहा कि इस सप्ताह गुरुवार को वीडियो देखे जाएंगे और उसके बाद 17 मार्च को अंतिम सुनवाई होगी।

इस मामले में याचिका वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो ने दाखिल की है, जिसमें एनएसए के तहत उनकी हिरासत को अवैध बताते हुए चुनौती दी गई है। वांगचुक पिछले वर्ष 26 सितंबर से हिरासत में हैं।

सुनवाई के दौरान केंद्र और लद्दाख प्रशासन की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को बताया कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अस्वस्थ हैं और उन्होंने मामले की सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि बार-बार स्थगन से देश में गलत संदेश जा रहा है।

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अदालत ने इस पर स्पष्ट किया कि 17 मार्च को होने वाली सुनवाई अंतिम होगी और उसी दिन निर्णय सुरक्षित रख लिया जाएगा। पीठ ने यह भी कहा कि उस दिन कोई नया मुद्दा उठाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

पीठ ने कहा, “हम स्पष्ट कर रहे हैं कि अगली मंगलवार को अंतिम सुनवाई के बाद हम आदेश सुरक्षित रखेंगे। नई दलीलें पेश करने की अनुमति नहीं होगी और सॉलिसिटर जनरल केवल सिब्बल द्वारा प्रत्युत्तर में उठाए गए नए बिंदुओं पर ही जवाब दे सकेंगे।”

इससे पहले सुनवाई के दौरान वांगचुक के भाषणों के अनुवाद को लेकर भी सवाल उठे थे। कपिल सिब्बल ने कहा कि जिन कथित भड़काऊ बयानों का उल्लेख हिरासत आदेश में किया गया है, वे केंद्र द्वारा अदालत में दाखिल अनुवादित भाषणों में दिखाई नहीं देते।

उन्होंने दलील दी कि हिरासत आदेश ऐसे आधार पर बनाया गया है जो वास्तव में मौजूद ही नहीं है और वांगचुक ने कभी भी सरकार को “उखाड़ फेंकने” जैसी कोई बात नहीं कही।

पीठ ने इस विसंगति पर केंद्र से मूल वीडियो रिकॉर्डिंग और उनके सही अनुवाद अदालत में पेश करने को कहा था।

मामले की सुनवाई पहले भी कई बार टल चुकी है। 26 फरवरी को भी सुप्रीम कोर्ट ने होली अवकाश के बाद सुनवाई करने का निर्णय लिया था। कई बार विभिन्न पक्षों के वकीलों की अनुपलब्धता के कारण भी सुनवाई स्थगित हुई।

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इससे पहले अदालत ने केंद्र से यह भी पूछा था कि क्या वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उनकी हिरासत पर पुनर्विचार की कोई संभावना है।

केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन ने अदालत को बताया है कि वांगचुक को सीमा से जुड़े संवेदनशील क्षेत्र में लोगों को भड़काने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। सरकार का कहना है कि 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा के पीछे उनके भाषणों की भूमिका थी, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और 161 लोग घायल हुए।

केंद्र ने यह भी कहा कि वांगचुक ने युवाओं को नेपाल और बांग्लादेश जैसे आंदोलनों से प्रेरित होकर विरोध प्रदर्शन करने के लिए उकसाने की कोशिश की। सरकार ने यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने अरब स्प्रिंग जैसे आंदोलन का संदर्भ दिया था, जिसके परिणामस्वरूप कई देशों में सरकारें गिर गई थीं।

हालांकि वांगचुक ने इन आरोपों से इनकार किया है। 29 जनवरी को उन्होंने अदालत में कहा कि उन्होंने कभी सरकार को गिराने की बात नहीं कही और उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से सरकार की आलोचना करने तथा विरोध दर्ज कराने का अधिकार है।

कपिल सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने “उधार लिए गए” और चुनिंदा वीडियो क्लिप का सहारा लेकर हिरासत आदेश को सही ठहराने की कोशिश की।

याचिका में गीतांजलि आंगमो ने वांगचुक की हिरासत को अवैध और मनमाना बताते हुए कहा है कि इससे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

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याचिका में यह भी कहा गया है कि पिछले तीन दशकों से शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योगदान देने वाले व्यक्ति को अचानक इस तरह निशाना बनाना पूरी तरह “अविश्वसनीय” है।

आंगमो ने यह भी कहा कि 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा के लिए वांगचुक के किसी बयान या कार्रवाई को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार वांगचुक ने स्वयं सोशल मीडिया के माध्यम से हिंसा की निंदा की थी और कहा था कि हिंसा से लद्दाख की पांच वर्षों की शांतिपूर्ण “तपस्या” विफल हो जाएगी।

लेह में 24 सितंबर को राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इसके दो दिन बाद 26 सितंबर को वांगचुक को एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था।

अब सुप्रीम कोर्ट 17 मार्च को अंतिम सुनवाई के बाद यह तय करेगा कि वांगचुक की हिरासत वैध है या नहीं।

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