‘पवित्र माँ-बेटी का रिश्ता’: शेक्सपियर की ‘मर्सी’ का हवाला देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के प्रयास का मामला रद्द किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक सद्भाव को कानून की कठोरता से ऊपर रखते हुए एक महिला के खिलाफ दर्ज हत्या के प्रयास (धारा 307 आईपीसी) के मामले को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच का रिश्ता माँ-बेटी जैसा है, जो सामाजिक रूप से “अद्वितीय और पवित्र” है। अदालत ने कहा कि “यदि न्याय को कभी दया (Mercy) के साथ जोड़ा जाना चाहिए, तो यह मामला उसके लिए बिल्कुल उपयुक्त है।”

न्यायमूर्ति प्रतीक जालान ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 (जो पूर्ववर्ती CrPC की धारा 482 के समान है) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह फैसला सुनाया। हालांकि मामला गंभीर था, लेकिन अदालत ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते और उनके भावनात्मक संबंधों को प्राथमिकता दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला साल 1993 से जुड़ा है, जब याचिकाकर्ता (जो उस समय महज तीन महीने की अनाथ बच्ची थी) को दिल्ली की एक जिला अदालत के आदेशानुसार उत्तरदाता संख्या 2 और उनके दिवंगत पति के संरक्षण (Guardianship) में दिया गया था। हालांकि औपचारिक रूप से कोई कानूनी गोद लेने की प्रक्रिया नहीं हुई थी, लेकिन याचिकाकर्ता बचपन से ही उनके साथ रही और उन्हीं के सहयोग से जीसस एंड मैरी कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की।

विवाद की शुरुआत 3 फरवरी 2019 को हुई, जब शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने प्रार्थना के दौरान उन पर लकड़ी के क्रॉस से हमला किया और बाद में चाकू से पेट और आंख पर वार किए। शुरुआत में एफआईआर धारा 308 (गैर-इरादतन हत्या का प्रयास) के तहत दर्ज की गई थी, लेकिन बाद में निचली अदालत ने इसे धारा 307 (हत्या का प्रयास) की श्रेणी में रखते हुए आरोप तय किए थे।

साल 2022 में दोनों पक्षों ने लोक अदालत के माध्यम से अपने नागरिक विवादों को सुलझा लिया था। इसके बाद, दिसंबर 2024 में मुकदमे के दौरान शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता को माफ करने और विवाद खत्म करने की इच्छा जताई।

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पक्षों की दलीलें

अभियोजन पक्ष (State) की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि धारा 307 एक जघन्य और गंभीर अपराध है जो समाज के खिलाफ माना जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि मामले में गवाही शुरू हो चुकी है और शिकायतकर्ता ने आरोपों का समर्थन करते हुए जिरह का सामना भी किया है।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के वकीलों ने 11 अगस्त 2025 को हुए समझौता ज्ञापन (MoU) का हवाला दिया। एक सेवानिवृत्त शिक्षिका रहीं शिकायतकर्ता ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि उन्होंने याचिकाकर्ता को “पिछली सभी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए माफ कर दिया है” और उन्हें एफआईआर रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

हाईकोर्ट ने ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य, नरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य और मध्य प्रदेश राज्य बनाम लक्ष्मी नारायण जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का संदर्भ लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि हालांकि धारा 307 को आमतौर पर जघन्य अपराध माना जाता है, लेकिन यदि सजा की संभावना बेहद कम हो और समझौते से भविष्य में शांति और सद्भाव की उम्मीद हो, तो हाईकोर्ट ऐसी कार्यवाही रद्द कर सकता है।

न्यायमूर्ति जालान ने अपने आदेश में कहा:

“पक्षों के बीच का संबंध माँ-बच्चे के रिश्ते के समान है, जिसे सामाजिक रूप से अद्वितीय और पवित्र माना जाता है… यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता और उत्तरदाता के बीच का रिश्ता, हालांकि कानूनी रूप से माता-पिता और बच्चे का नहीं था, लेकिन सामाजिक और भावनात्मक रूप से इससे अलग भी नहीं था।”

अदालत ने शेक्सपियर के नाटक ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में पोर्टिया के ‘क्वालिटी ऑफ मर्सी’ (दया की विशेषता) भाषण का उल्लेख करते हुए कहा:

“दया की भावना को मजबूर नहीं किया जा सकता। यह स्वर्ग से गिरने वाली कोमल बारिश की तरह है… इस मामले के विशिष्ट तथ्यों को देखते हुए, याचिकाकर्ता को सजा दिलाने के किसी भी सामाजिक या सार्वजनिक हित से ऊपर यह गहन भावना होनी चाहिए।”

हाईकोर्ट का निर्णय

एफआईआर (नंबर 109/2019, थाना शाहबाद डेयरी) को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने भविष्य के विवादों को टालने के लिए पक्षों की कानूनी स्थिति भी स्पष्ट की। याचिकाकर्ता ने अदालत में स्वीकार किया कि वह “दत्तक पुत्री” (Adopted daughter) नहीं थी और उसका उत्तरदाता की संपत्ति या विरासत पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

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अदालत ने कार्यवाही रद्द करने की शर्त के रूप में याचिकाकर्ता को सामुदायिक सेवा (Community Service) करने का निर्देश दिया। उसे सेंट स्टीफंस अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक को रिपोर्ट करने और अगले चार महीनों के भीतर तीन-तीन घंटे के कुल 30 सत्रों में अपनी सेवाएं देने का आदेश दिया गया है।

केस विवरण (Case Details)

  • केस का शीर्षक: एंटोनेट पामेला फर्नांडीज बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली और अन्य (Antonette Pamela Fernandez vs. State NCT of Delhi and Anr.)
  • केस संख्या: CRL.M.C. 7253/2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति प्रतीक जालान

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