दीवानी प्रक्रियाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि वाद (सूट) के लंबित रहने के दौरान कब्जे से संबंधित कोई नया कारण (Cause of Action) उत्पन्न होता है, तो वाद पत्र में संशोधन के आवेदन को केवल देरी या ‘इश्यूज’ (विवादक) तय हो जाने के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत के उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिन्होंने वादी के संशोधन आवेदन को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने वादी को अपने घोषणा के वाद (Suit for Declaration) में कब्जे (Possession) की डिक्री जोड़ने की अनुमति प्रदान की है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अनेंद्र सिंह (वादी) ने 29 मई 2015 को विवादित संपत्ति के स्वामित्व की घोषणा के लिए एक वाद दायर किया था। वादी का दावा मूल मालिक द्वारा उसके पक्ष में निष्पादित ‘वसीयत’ पर आधारित था। वाद लंबित रहने के दौरान, मई 2022 में याचिकाकर्ता ने संशोधन के लिए एक आवेदन दिया।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि जून 2019 में, जब मुकदमा चल रहा था, प्रतिवादियों ने विवादित संपत्ति पर जबरन कब्जा कर लिया। इस कारण याचिकाकर्ता ने वाद पत्र में संशोधन कर कब्जे की डिक्री की मांग को भी शामिल करने का अनुरोध किया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट (अपर सिविल जज, सीनियर डिवीजन, कोर्ट नंबर 8, फर्रुखाबाद) ने 23 फरवरी 2024 को इस आवेदन को खारिज कर दिया। इसके खिलाफ दाखिल की गई पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री देवेश कुमार वर्मा ने तर्क दिया कि यह संशोधन एक “परिणामी राहत” (Consequential Relief) के लिए था क्योंकि कब्जे से बेदखल होने की घटना वाद दायर करने के बाद हुई थी। उन्होंने दलील दी कि संशोधन आवेदन बेदखली की तारीख से तीन साल की सीमा अवधि के भीतर दायर किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि संशोधन की अनुमति देने से “मुकदमों की बहुलता” (Multiplicity of Proceedings) से बचा जा सकेगा, क्योंकि इसके लिए एक अलग मुकदमा भी दायर किया जा सकता था।
वहीं प्रतिवादियों के वकील श्री अजय सिंह कुशवाहा ने कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आवेदन में “अत्यधिक देरी” की गई है, क्योंकि यह कथित कब्जे के लगभग तीन साल बाद दायर किया गया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सी.पी.सी. के आदेश VI नियम 17 के प्रावधानों के तहत यह संशोधन वर्जित है क्योंकि मामले में ‘इश्यूज’ तय हो चुके हैं और तकनीकी रूप से विचारण (Trial) शुरू हो चुका है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के निष्कर्षों से असहमति जताई। न्यायमूर्ति निगम ने पाया कि संशोधन का उद्देश्य वाद दायर करने के बाद की घटना पर आधारित राहत को शामिल करना था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“एक बार जब स्वतंत्र वाद दायर करना अनुमेय (Permissible) हो, तो लंबित वाद में संशोधन के माध्यम से राहत देने से इनकार करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि इससे कानूनी कार्यवाही की बहुलता कम होगी।”
सुप्रीम कोर्ट के संपत कुमार बनाम अयाकन्नू और अन्य (2002) 7 SCC 559 मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वाद के लंबित रहने के दौरान उत्पन्न होने वाले कारणों के आधार पर राहत की प्रकृति बदलने से वाद की मूल संरचना नहीं बदलती है।
आदेश VI नियम 17 के तहत ‘विचारण की शुरुआत’ (Commencement of Trial) के मुद्दे पर, कोर्ट ने चित्रांशी बनाम राजनारायण त्रिपाठी [2025 (5) AWC 4867] मामले का संदर्भ दिया। इसमें कहा गया है कि सामान्यतः विचारण साक्ष्य (Evidence) दर्ज करने के साथ शुरू होता है। वर्तमान मामले में, हालांकि ‘इश्यूज’ तय हो गए थे, लेकिन साक्ष्य की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई थी।
देरी के संबंध में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शब्दों को उद्धृत किया:
“संशोधन आवेदन में देरी का प्रश्न केवल वाद दायर करने की तिथि से नहीं, बल्कि मुकदमे की सुनवाई किस चरण तक पहुंची है, इसके संदर्भ में तय किया जाना चाहिए… तथ्य यह है कि मात्र देरी संशोधन की प्रार्थना को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकती।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालतों ने संशोधन के गुण-दोषों (Merits) पर पहले से ही राय बनाकर गलती की, जबकि कब्जे के वास्तविक तथ्य का फैसला साक्ष्य पेश होने के बाद ही किया जाना चाहिए।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने 23 फरवरी 2024 और 3 जुलाई 2024 के आदेशों को रद्द कर दिया। यह देखते हुए कि मामला 2019 से लंबित है, कोर्ट ने मामले को वापस भेजने के बजाय स्वयं संशोधन आवेदन को स्वीकार कर लिया। याचिकाकर्ता को आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने की तिथि से तीन सप्ताह के भीतर संशोधन पूरा करने का निर्देश दिया गया है।
- केस शीर्षक: अनेंद्र सिंह बनाम राम किशन और अन्य
- केस संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 संख्या 14134/2024

