दिल्ली हाईकोर्ट ने पोक्सो मामले में दरवाजा बाहर से बंद करने की आरोपी महिला को दी अग्रिम जमानत, कहा- प्रथम दृष्टया भूमिका कपल को “प्राइवेसी” देने तक सीमित थी

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला को अग्रिम जमानत दी है, जिस पर आरोप था कि उसने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर एक नाबालिग पीड़िता और एक युवक को अकेला छोड़ा, जिसके बाद कथित तौर पर यौन उत्पीड़न हुआ। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि चूंकि दोनों के बीच पहले से प्रेम संबंध थे, इसलिए प्रथम दृष्टया आरोपी महिला की भूमिका केवल उन्हें प्राइवेसी देने तक सीमित थी। अदालत के अनुसार, वर्तमान में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह दर्शित हो कि महिला को यह जानकारी थी कि वहां जबरन यौन संबंध बनाए जाएंगे।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदिका जैनब खातून ने दयालपुर थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 91/2026 के मामले में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64(1), 351, 3(5) और पोक्सो (POCSO) अधिनियम की धारा 6 के तहत दर्ज की गई थी।

आरोपों के अनुसार, नाबालिग पीड़िता मेहंदी सीखने के लिए आवेदिका के घर जाती थी, जहां ‘एम’ (कानून से संघर्षरत किशोर) नामक युवक भी आता था। आरोप है कि आवेदिका ने पीड़िता को आश्वासन दिया था कि वह उसकी शादी ‘एम’ से करा देगी।

दर्ज शिकायत के अनुसार, एक दिन जब पीड़िता मेहंदी सीख रही थी, तब आवेदिका ने ‘एम’ को बुलाया और उसे उस कमरे में भेजा जहां पीड़िता मौजूद थी। इसके बाद आवेदिका ने दरवाजा बाहर से बंद कर दिया, जिसके दौरान ‘एम’ ने कथित तौर पर पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। आरोप है कि घटना के बाद आवेदिका ने दरवाजा खोला, ‘एम’ को भागने में मदद की और पीड़िता को घटना की जानकारी किसी को न देने की धमकी दी। एफआईआर के अनुसार, 17 फरवरी 2026 को ‘एम’ ने पीड़िता के घर पर उसकी मां की अनुपस्थिति में दोबारा कथित रूप से बलात्कार किया, जिसके बाद 27 फरवरी 2026 को शिकायत दर्ज कराई गई।

पक्षों की दलीलें

आवेदिका के वकील ने तर्क किया कि ‘एम’ और पीड़िता के बीच सहमति से संबंध थे और दोनों ही बालिग होने की आयु के करीब थे। उन्होंने कहा कि आवेदिका पर केवल दोनों को अकेला छोड़ने के लिए दरवाजा बाहर से बंद करने का आरोप है। इसके अतिरिक्त, घटना की किसी निश्चित तिथि का उल्लेख न होने का आधार रखते हुए आवेदिका को गिरफ्तार न किए जाने का अनुरोध किया गया।

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राज्य के अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने जांच अधिकारी एसआई रितु सिंह की सहायता से इस याचिका का विरोध किया। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि आरोप गंभीर हैं क्योंकि आवेदिका ने ही ‘एम’ और पीड़िता के बीच संबंधों को बढ़ावा दिया था। अभियोजक के अनुसार, भले ही दोनों के बीच निकट संबंध थे, परंतु यह जबरन शारीरिक संबंध बनाने को न्यायसंगत नहीं ठहराता।

पीड़िता के वकील ने भी, जो पीड़िता के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे, अपराध की गंभीरता के आधार पर अग्रिम जमानत का विरोध किया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

न्यायूमूर्ति गिरीश कठपालिया ने रेखांकित किया कि आवेदिका और पीड़िता एक ही इमारत में रहते हैं। हाईकोर्ट ने पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट (MLC) का संज्ञान लिया, जिसमें राय दी गई थी कि “यौन उत्पीड़न की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।” इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि “एमएलसी में ऐसे कोई मापदंड दर्ज नहीं हैं, जिसके आधार पर डॉक्टर ने इतनी अस्पष्ट राय दी है।”

आवेदिका की भूमिका के संबंध में हाईकोर्ट ने नोट किया कि उसने दोनों को प्राइवेसी देने के लिए दरवाजा बाहर से बंद किया था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पीड़िता के नाबालिग होने के कारण कानूनन सहमति का महत्व नहीं है, फिर भी चूंकि वह बालिग होने की उम्र के करीब थी, इसलिए उसकी गवाही का परीक्षण उसी परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए।

कार्यवाही के दौरान आवेदिका के वकील ने पीड़िता और ‘एम’ की छह तस्वीरें रिकॉर्ड पर रखीं। हाईकोर्ट ने पाया कि तस्वीरों में दोनों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जिससे “उनके प्रेम संबंधों के बारे में कोई संदेह नहीं रहता।”

सहमति और संबंधों की कानूनी सीमा पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति कठपालिया ने टिप्पणी की:

“बेशक, प्रेम संबंध जबरन शारीरिक संबंध बनाने का अधिकार नहीं देते। लेकिन जहां तक वर्तमान आरोपी/आवेदिका का संबंध है, इन तस्वीरों और ‘एम’ व पीड़िता के बीच के संबंधों को देखते हुए, आरोपी/आवेदिका की भूमिका अधिक से अधिक उन्हें कमरे में कुछ प्राइवेसी देने तक ही प्रतीत होती है।”

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हाईकोर्ट ने आगे कहा:

“प्रथम दृष्टया, वर्तमान में ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे यह दर्शित हो कि आरोपी/आवेदिका को इस बात की जानकारी थी कि ‘एम’ पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाएगा।”

हाईकोर्ट का निर्णय

आवेदिका के महिला होने और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने माना कि यह उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने का उपयुक्त मामला नहीं है।

हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में जैनब खातून को ₹10,000/- के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत पर रिहा कर दिया जाए। आवेदिका को जांच अधिकारी द्वारा लिखित निर्देश दिए जाने पर जांच में शामिल होने का आदेश भी दिया गया।

हाईकोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि जमानत आदेश में की गई टिप्पणियों का ट्रायल के अंतिम चरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मामले का विवरण

  • केस का शीर्षक: सुश्री जैनब खातून बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य सरकार
  • केस संख्या: अग्रिम जमानत आवेदन 1519/2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया
  • निर्णय की तिथि: 25 मई, 2026

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