मकान मालिक द्वारा वैकल्पिक संपत्तियों के मालिकाना हक से स्पष्ट इनकार न करना “विचारणीय मुद्दा”: दिल्ली हाई कोर्ट ने बेदखली का आदेश रद्द किया

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए किरायेदारों के पक्ष में बड़ा निर्णय दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई किरायेदार मकान मालिक के पास अन्य उपयुक्त वैकल्पिक संपत्तियां होने का पुख्ता दावा करता है, और मकान मालिक उन दावों का साफ-साफ खंडन करने के बजाय अस्पष्ट या गोलमोल जवाब देता है, तो यह कानून की नजर में एक “विचारणीय मुद्दा” (Triable Issue) बन जाता है। ऐसे विवादों का निपटारा बिना पूरी अदालती सुनवाई (ट्रायल) के केवल हलफनामों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

इस कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए न्यायमूर्ति अमित शर्मा ने अतिरिक्त किराया नियंत्रक (ARC) द्वारा पारित उस बेदखली आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें किरायेदार को अपना पक्ष रखने (Leave to Defend) की अनुमति दिए बिना ही दुकान खाली करने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट ने किरायेदारों की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें मुकदमा लड़ने की अनुमति दे दी है और मामले को वापस निचली अदालत भेज दिया है।

क्या था पूरा विवाद?

यह कानूनी लड़ाई पुरानी दिल्ली के मशहूर चांदनी चौक (कटरा हीरा लाल) में स्थित महज 9 गुना 7 फीट की एक व्यावसायिक दुकान से शुरू हुई थी। इस दुकान के मकान मालिक रवि चंद गर्ग हैं, जो पिछले 24 वर्षों से दिल्ली की अदालतों में वकालत कर रहे हैं। उन्होंने साल 2017 में दिल्ली किराया नियंत्रण कानून (DRCA) की धारा 14(1)(ई) के तहत किरायेदार सुभाष चंद और दिनेश चंद के खिलाफ बेदखली का मुकदमा दायर किया था। (मुकदमे के दौरान सुभाष चंद का निधन हो गया, जिसके बाद उनकी पत्नी, बेटे और बेटियों को कानूनी वारिस के रूप में शामिल किया गया)।

मकान मालिक का तर्क था कि तीस हजारी कोर्ट स्थित उनके चैंबर नंबर 194 में जगह की भारी कमी हो गई है। कानून की किताबों, पत्रिकाओं और मुवक्किलों की फाइलों के अंबार के कारण वहां बैठना भी मुश्किल है। उन्होंने दावा किया कि वह अपनी अतिरिक्त फाइलें और पुरानी पुस्तकें दरियागंज में अपने भाई के घर के एक कमरे में रख रहे थे, लेकिन सेवानिवृत्त भाई ने नवंबर 2017 तक उस कमरे को भी खाली करने के लिए कह दिया था। मकान मालिक के अनुसार, इस भंडारण के लिए उनके पास उस दुकान के अलावा चांदनी चौक में कोई अन्य वैकल्पिक जगह उपलब्ध नहीं थी।

दूसरी ओर, किरायेदारों का इतिहास भी इस संपत्ति से पुराना था, जो 1974 के एक किराया नोट से शुरू हुआ था। रवि चंद गर्ग ने इसे 1997 में खरीदा था और बाद में कानूनन किराया भी बढ़ाया था। दोनों पक्षों के बीच पुराना विवाद इस कदर गहरा था कि 2002 में मकान मालिक द्वारा दायर किराया वसूली के एक मुकदमे को अपील में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया था कि मकान मालिक “साफ हाथों से अदालत में नहीं आए हैं।”

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अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

किरायेदारों का दावा: “मकान मालिक छुपा रहे हैं अपनी खाली संपत्तियां”

किरायेदारों की पैरवी कर रहे अधिवक्ता श्री तन्मय मेहता, श्री अनुनय मेहता और सुश्री आनंदिता तायल ने अदालत में दलील दी कि मकान मालिक ने अपनी कई उपयुक्त वैकल्पिक संपत्तियों को जानबूझकर छिपाया है। किरायेदारों ने अपने ‘लीव टू डिफेंड’ के हलफनामे (पैरा 48) में मकान मालिक के कब्जे वाली चांदनी चौक, नई सड़क, गली भैरों वाली और दरियागंज स्थित पांच बड़ी संपत्तियों की सूची सौंप दी।

किरायेदारों ने यह भी दावा किया कि बाजार सीता राम में स्थित मकान मालिक की संपत्ति संख्या 3384 पूरी तरह से खाली पड़ी है। इसे साबित करने के लिए किरायेदारों ने कोर्ट में बिजली बिल पेश किए, जिनमें मासिक खपत लगभग शून्य (कई महीनों में केवल 2 या 3 यूनिट) दिखाई गई थी। उनका तर्क था कि इतनी कम बिजली खपत से साफ है कि वह मकान खाली है और फाइलों या किताबों के भंडारण के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।

इसके अलावा, किरायेदारों ने नई तस्वीरों के साथ यह भी दावा कि दुकान संख्या 681 और संपत्ति संख्या 679 पिछले 10 से 15 वर्षों से बंद पड़ी हैं, जिससे मकान मालिक का यह दावा झूठा साबित होता है कि वे सक्रिय किरायेदारों के कब्जे में हैं।

मकान मालिक का जवाब: “मकान मालिक ही अपनी जरूरत का सबसे अच्छा जज”

मकान मालिक की ओर से अधिवक्ता श्री जय सहायक एंडलॉ, सुश्री श्रुति कपूर और सुश्री अंजू अग्रवाल ने इन दावों का विरोध किया। उनका मुख्य तर्क यह था कि किराया कानून के तहत मकान मालिक को अपनी जरूरत तय करने का पूरा अधिकार है और किरायेदार उसे यह निर्देश नहीं दे सकता कि वह किस संपत्ति का उपयोग करे।

मकान मालिक का कहना था कि:

  • बाजार सीता राम वाली संपत्ति उनका निजी निवास है। चूंकि वह देर रात तक चैंबर में काम करते हैं और केवल सोने के लिए घर आते हैं, इसलिए वहां बिजली की खपत नगण्य होना स्वाभाविक है।
  • किरायेदारों द्वारा पैरा 48 में बताई गई संपत्तियां या तो उनके स्वामित्व में नहीं हैं, उनके भाई की हैं, या पहले से ही अन्य किरायेदारों के अधीन हैं।
  • हाई कोर्ट का पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार अत्यंत सीमित है और वह निचली अदालत के साक्ष्यों के मूल्यांकन में तब तक दखल नहीं दे सकता जब तक कि कोई बड़ी कानूनी भूल न हो।
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हाई कोर्ट का विश्लेषण: निचली अदालत से कहाँ हुई चूक?

न्यायमूर्ति अमित शर्मा ने मामले के रिकॉर्ड और अतिरिक्त किराया नियंत्रक के फैसले की गहन समीक्षा की। हाई कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने किरायेदारों द्वारा दी गई संपत्तियों की सूची को अपने आदेश में केवल औपचारिक रूप से दर्ज तो किया, लेकिन उन पर कोई वास्तविक विश्लेषण या फैसला नहीं सुनाया।

हाई कोर्ट ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की: “विद्वान किराया नियंत्रक (ARC) द्वारा वैकल्पिक उपयुक्त आवास के संबंध में दिए गए निष्कर्षों के अवलोकन से पता चलता है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा लीव टू डिफेंड के अपने आवेदन में उल्लेखित संपत्तियों का केवल संदर्भ दिया गया था, लेकिन विवादित आदेश में उन पर कोई विचार नहीं किया गया, और न ही विद्वान किराया नियंत्रक द्वारा उक्त संपत्तियों के संबंध में कोई विशिष्ट निष्कर्ष दिया गया है।”

कोर्ट ने आगे जोड़ा कि किरायेदारों के स्पष्ट दावों के जवाब में मकान मालिक ने पैरा 48 की संपत्तियों के मालिकाना हक को लेकर केवल एक सामान्य और गोलमोल खंडन प्रस्तुत किया था, जो कि कानूनन नाकाफी है: “प्रतिवादी (मकान मालिक) ने उक्त संपत्तियों की स्थिति के संबंध में कोई स्पष्ट कथन भी नहीं दिया था… प्रतिवादी की ओर से दी गई इस अस्पष्ट प्रतिक्रिया को देखते हुए, यह एक विचारणीय मुद्दा (triable issue) होगा।”

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हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले शिव सरूप गुप्ता बनाम डॉ. महेश चंद गुप्ता (1999) का हवाला देते हुए अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार की सीमाओं को स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि हाई कोर्ट तथ्यों की अदालत की तरह सबूतों को दोबारा तौलने नहीं बैठता, लेकिन निचली अदालत के फैसले को “क्या यह कानून के अनुसार है” की कसौटी पर परखना उसका कर्तव्य है। निचली अदालत द्वारा वैकल्पिक संपत्तियों के गंभीर सवाल को नजरअंदाज करना कानूनन एक बड़ी भूल थी।

अंतिम निर्णय

दिल्ली हाई कोर्ट ने किरायेदारों की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए अतिरिक्त किराया नियंत्रक के 9 अगस्त 2018 के बेदखली आदेश को रद्द कर दिया। किरायेदारों के ‘लीव टू डिफेंड’ आवेदन को मंजूर कर लिया गया है।

अदालत ने मामले को वापस अतिरिक्त किराया नियंत्रक के पास ट्रायल के लिए भेज दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष निचली अदालत के समक्ष नए सिरे से अपने साक्ष्य और गवाह पेश करने के लिए स्वतंत्र हैं और किराया नियंत्रक हाई कोर्ट की किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना इस मामले का स्वतंत्र रूप से फैसला करेंगे।

मामले का विवरण

  • मामले का नाम: सुभाष चंद (मृतक) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से एवं अन्य बनाम रवि चंद गर्ग
  • केस नंबर: RC.REV. 69/2019 और CM APPL. 5613-14/2019
  • जज: न्यायमूर्ति अमित शर्मा
  • फैसले की तारीख: 21 मई, 2026

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