आर्बिट्रल अवार्ड की हस्ताक्षरित प्रति पार्टी को न मिलना धारा 34 की समय सीमा को शून्य कर देता है: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन एंड कॉनसिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34(3) के तहत मध्यस्थता निर्णय (आर्बिट्रल अवार्ड) को चुनौती देने की वैधानिक समय सीमा केवल उसी दिन से शुरू होती है जब अवार्ड की एक हस्ताक्षरित प्रति सीधे संबंधित पार्टी को प्रदान की जाती है। जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने एक जिला न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने देरी के आधार पर चुनौती को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 31(5) के तहत प्रति सौंपने की अनिवार्य आवश्यकता, परिसीमा (limitation) की घड़ी शुरू होने के लिए एक पूर्व-शर्त है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 19 दिसंबर 2007 के एक समझौते से उपजा था, जिसमें अपीलकर्ता डी.के. भुइया ने प्रतिवादी/डेवलपर ए.के. सिन्हा से ₹16,50,000 में “कंचनपुरम अपार्टमेंट” में एक फ्लैट खरीदा था। अपीलकर्ता का आरोप था कि पूरा भुगतान करने के बावजूद फ्लैट में निर्माण संबंधी गंभीर कमियां थीं और वादा की गई सुविधाएं नहीं दी गईं।

अपीलकर्ता ने शुरू में उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया, जिसने मुआवजा देने का आदेश दिया। जब उपभोक्ता कार्यवाही चल रही थी, डेवलपर ने विवाद को आर्बिट्रेशन के लिए भेज दिया। एक एकल मध्यस्थ (Sole Arbitrator) ने 18 अगस्त 2016 को एकपक्षीय (ex parte) अवार्ड पारित किया, जिसमें अपीलकर्ता को 18% वार्षिक ब्याज के साथ ₹4,03,000 भुगतान करने का निर्देश दिया गया।

अपीलकर्ता का दावा था कि उसे इस अवार्ड की कोई हस्ताक्षरित प्रति कभी नहीं मिली और उसे पहली बार 23 जुलाई 2019 को निष्पादन कार्यवाही (execution proceedings) के दौरान इसकी जानकारी हुई। इसके बाद उन्होंने धारा 34 के तहत आवेदन दायर किया, जिसे 5 नवंबर 2022 को द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, दुर्ग ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह निर्धारित समय सीमा के बाहर था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 34(3) के तहत समय सीमा केवल धारा 31(5) के अनुसार अवार्ड की हस्ताक्षरित प्रति प्राप्त होने की तारीख से शुरू होती है। यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता ने 2019 में अवार्ड की जानकारी मिलते ही नेक नीयत (bona fide) से कदम उठाए और जिला न्यायालय ने अवार्ड पारित होने की तारीख पर ध्यान केंद्रित करके गलती की, जबकि उसे अवार्ड की तामील की तारीख पर ध्यान देना चाहिए था।

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प्रतिवादी ने तर्क दिया कि अपील निराधार है क्योंकि अवार्ड 2016 में पारित हुआ था और धारा 34 का आवेदन केवल 2022 में दायर किया गया था। उनका कहना था कि कोर्ट के पास अधिनियम द्वारा निर्धारित “तीन महीने प्लस तीस दिन” की सख्त अवधि के बाद देरी को माफ करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, और अवार्ड की प्रति न मिलने का दावा केवल एक बहाना है।

कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने अधिनियम की धारा 34(3) और धारा 31(5) के बीच संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया। धारा 31(5) आदेश देती है कि “आर्बिट्रल अवार्ड की एक हस्ताक्षरित प्रति प्रत्येक पार्टी को वितरित की जाएगी।”

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सुप्रीम कोर्ट के मामले बेनारशी कृष्णा कमेटी और अन्य बनाम कर्मयोगी शेल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड (2012) 9 SCC 496 का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“यदि हस्ताक्षरित अवार्ड की प्रति स्वयं पार्टी को नहीं दी जाती है, तो यह 1996 के अधिनियम की धारा 31(5) के प्रावधानों का पालन नहीं माना जाएगा।”

जस्टिस गुरु ने उल्लेख किया कि जिला न्यायालय इस “धारणा पर आगे बढ़ा कि अवार्ड 18.08.2016 को पारित किया गया था” और समय सीमा समाप्त हो गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“विचार करने योग्य महत्वपूर्ण पहलू अवार्ड की हस्ताक्षरित प्रति प्राप्त होने की तारीख थी, न कि केवल अवार्ड की घोषणा की तारीख।”

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कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि निष्पादन कार्यवाही के दौरान जानकारी प्राप्त होने के तुरंत बाद आवेदन दायर करने का अपीलकर्ता का आचरण उसकी सतर्कता को दर्शाता है। निचली अदालत के दृष्टिकोण को “अत्यधिक तकनीकी” (hyper-technical) बताया गया क्योंकि उसने यह निर्धारित नहीं किया कि अवार्ड की तामील वास्तव में कब और किस तरह से हुई थी।

कोर्ट का निर्णय

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 5 नवंबर 2022 के आदेश को रद्द कर दिया है। मामले को वापस द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, दुर्ग के पास भेजा गया है ताकि धारा 34 के आवेदन पर “देरी के प्रश्न पर जोर दिए बिना” इसके गुणों के आधार पर नए सिरे से विचार किया जा सके।

  • केस का शीर्षक: डी.के. भुइया बनाम ए.के. सिन्हा
  • केस नंबर: एआरबीए नंबर 4 ऑफ 2023

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