इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग जांच के लिए नई समिति गठित

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तीन सदस्यीय जांच समिति का पुनर्गठन किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही महाभियोग की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी।

यह पूरा मामला पिछले साल जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर मिले ‘जले हुए नोटों के ढेर’ से जुड़ा है, जिसने देशभर में हड़कंप मचा दिया था।

नई जांच समिति का स्वरूप

लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी नोटिस के अनुसार, इस समिति का पुनर्गठन उन आधारों की जांच के लिए किया गया है जिनके तहत जस्टिस वर्मा को पद से हटाने (महाभियोग) की प्रार्थना की गई है। इस उच्च-स्तरीय समिति में निम्नलिखित सदस्य शामिल हैं:

  • जस्टिस अरविंद कुमार: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश।
  • जस्टिस श्री चंद्रशेखर: बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश।
  • बी.वी. आचार्य: वरिष्ठ अधिवक्ता और कर्नाटक के पूर्व एडवोकेट जनरल।
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इससे पहले अगस्त में गठित समिति में मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम.एम. श्रीवास्तव शामिल थे, जिनके स्थान पर अब बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को नियुक्त किया गया है।

क्या था मामला? ‘जले हुए नोटों’ की कहानी

यह विवाद 14 मार्च 2023 को होली के दौरान शुरू हुआ था। दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आधिकारिक बंगले पर आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को वहां नोटों की गड्डियां जलती हुई मिली थीं। इस घटना के बाद हड़कंप मच गया और उन्हें तुरंत दिल्ली हाईकोर्ट से वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया।

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जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों को “हास्यास्पद” बताते हुए कहा था कि उन्हें इस नकदी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक आंतरिक पैनल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उनके महाभियोग की सिफारिश की थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने इस रिपोर्ट को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विचारार्थ भेजा था।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और संसदीय कार्यवाही

संसदीय प्रक्रिया के तहत 146 सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का समर्थन किया था। जस्टिस वर्मा ने इस प्रक्रिया और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत गठित समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि अध्यक्ष ने नियमों का उल्लंघन करते हुए एकतरफा निर्णय लिया है।

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जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रावधानों का उपयोग संसदीय कार्यवाही को रोकने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। न्यायाधीशों ने कहा कि जस्टिस वर्मा के तर्कों का कोई कानूनी आधार नहीं है और इस तरह की दलीलों को स्वीकार करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

अब नई समिति के गठन के साथ ही, इस मामले की जांच में तेज़ी आने की उम्मीद है, जो देश के उच्च न्यायपालिका में जवाबदेही के लिहाज से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

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