धारा 138 एनआई एक्ट में लिमिटेशन की शुरुआत चेक बाउंस की तारीख से होगी, समझौते की तारीख से नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में दोषी की सजा को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज करने के लिए समय सीमा (Limitation Period) की गणना चेक प्रस्तुत करने और उसके अनादरण (Dishonour) की तारीख से की जाती है, न कि पार्टियों के बीच हुए किसी पुराने समझौते (MoU) की तारीख से।

जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने ओमपाल यादव द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज करते हुए निचली अदालतों के निष्कर्षों की पुष्टि की, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता की देनदारी कानूनी रूप से प्रवर्तनीय थी और मामला ‘समय-बाधित’ (Time-barred) नहीं था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 22 मई 2009 को प्रतिवादी, फरहान एम्पैक्सो एक्सपोर्ट एंड इंपोर्ट कंपनी और याचिकाकर्ता के भाई, गजेंद्र सिंह के बीच निष्पादित एक समझौता ज्ञापन (MoU) से जुड़ा है। इस समझौते के तहत बटला हाउस, जामिया नगर, ओखला, नई दिल्ली में एक संपत्ति के संयुक्त निर्माण और उसके बाद मुनाफे को आनुपातिक रूप से साझा करने की बात तय हुई थी।

शिकायत के अनुसार, निर्माण पूरा होने के बाद, याचिकाकर्ता और उसके भाई ने प्रतिवादी की सहमति के बिना संपत्ति बेच दी और मुनाफे का हिस्सा नहीं दिया। इस देनदारी को चुकाने के लिए, ओमपाल यादव ने 14 मार्च 2017 को 8,00,000 रुपये का एक चेक जारी किया।

यह चेक 18 मई 2017 को “खाता बंद” (Account Closed) टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। 7 जून 2017 को कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद, जब भुगतान नहीं किया गया, तो प्रतिवादी ने एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई।

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साकेत कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने 26 अप्रैल 2022 को याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया और 12,50,000 रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया, जिसे न भरने पर छह महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) ने 10 अप्रैल 2024 को इस फैसले को बरकरार रखा था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट के समक्ष दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता पीयूष पाहुजा ने एएसजे के आदेश को मुख्य रूप से तीन आधारों पर चुनौती दी:

  1. अनुबंध की गोपनीयता (Privity of Contract): यह तर्क दिया गया कि एमओयू याचिकाकर्ता के भाई द्वारा निष्पादित किया गया था, न कि स्वयं याचिकाकर्ता द्वारा। इसलिए, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई “कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण” नहीं था और दायित्व किसी तीसरे पक्ष तक विस्तारित नहीं किया जा सकता।
  2. लिमिटेशन (Limitation): याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि एमओयू 2009 में निष्पादित किया गया था और निर्माण 2009-2010 में पूरा हो गया था। इसलिए, 2016-2017 में शिकायत दर्ज करते समय दायित्व समय-बाधित (Time-barred) हो चुका था।
  3. स्वामित्व का प्रमाण: यह आरोप लगाया गया कि प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहा कि वह शिकायतकर्ता फर्म का एकमात्र मालिक (Sole Proprietor) है।

इसके विपरीत, प्रतिवादी के वकील राज कुमार ने तर्क दिया कि एनआई एक्ट की धारा 118(a) और धारा 139 के तहत वैधानिक अनुमान सही ढंग से लागू किए गए थे, खासकर जब याचिकाकर्ता ने उनका खंडन करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने पाया कि चेक पर हस्ताक्षर और कानूनी नोटिस की प्राप्ति स्वीकार की गई थी। परिणामस्वरूप, एनआई एक्ट के तहत प्रतिवादी के पक्ष में उपधारणा (Presumption) उत्पन्न हुई। कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता कोई भी सबूत पेश करने में विफल रहा और उसने केवल सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अपने बयान पर भरोसा किया, जो उपधारणा को गलत साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

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तीसरे पक्ष के दायित्व पर: अपने भाई की देनदारी के लिए चेक जारी करने के तर्क को संबोधित करते हुए, हाईकोर्ट ने एएसजे के निष्कर्ष को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा:

“शिकायतकर्ता/प्रतिवादी द्वारा किए गए दावों और पेश किए गए सबूतों को देखते हुए, आरोपी/याचिकाकर्ता द्वारा अपने भाई की ओर से मुनाफे के हिस्से के भुगतान के लिए चेक जारी करने में कुछ भी संदिग्ध या अविश्वसनीय नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता दिल्ली पुलिस का कर्मचारी है और “कानून और आपराधिक न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ है।”

लिमिटेशन पर: हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि चूंकि एमओयू 2009 का था, इसलिए ऋण समय-बाधित था। जस्टिस बनर्जी ने निचली अदालत के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए कहा:

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“लिमिटेशन के मुद्दे के संदर्भ में, विद्वान ट्रायल कोर्ट ने सही टिप्पणी की कि धारा 138 एनआई एक्ट के तहत दायर शिकायत मामले में लिमिटेशन की गणना करने के लिए चेक जारी करने और उसके अनादरण (Dishonour) की तारीख प्रासंगिक है; एमओयू की तारीख का लिमिटेशन अवधि की गणना में कोई प्रासंगिकता नहीं है।”

स्वामित्व पर: प्रतिवादी की स्थिति के संबंध में, कोर्ट ने कहा:

“चूंकि चेक मैसर्स फरहान एम्पैक्सो एक्सपोर्ट एंड इंपोर्ट कंपनी के नाम से जारी किया गया था, इसलिए प्रतिवादी के लिए इसके साथ अपने संबंधों को दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने राजेश जैन बनाम अजय सिंह (2023) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा जताते हुए निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता वैधानिक उपधारणा को गलत साबित करने के अपने दायित्व को निभाने में विफल रहा।

परिणामस्वरूप, कोर्ट ने रिविजन याचिका को खारिज कर दिया और 12,50,000 रुपये के जुर्माने की सजा को बरकरार रखा।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: ओमपाल यादव बनाम फरहान एम्पैक्सो एक्सपोर्ट एंड इंपोर्ट कंपनी
  • केस नंबर: CRL.REV.P. 633/2024
  • कोरम: जस्टिस सौरभ बनर्जी
  • याचिकाकर्ता के वकील: अधिवक्ता पीयूष पाहुजा और उपेंद्र कुमार
  • प्रतिवादी के वकील: अधिवक्ता राज कुमार और एच. रहमान

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